मंजूनाथ षणमुखम के जीवन पर आधारित यह फिल्म तेल माफिया के आतंक को दिखाती है। 2005 में लखीमपुर खीरी में मिलावटी पेट्रोल बेचने वाले एक पेट्रोल पंप का लाइसेंस रद्द करने की बात कहने पर इंडियन ऑइल के सेल्स मैनेजर मंजूनाथ षणमुखम की हत्या कर दी गई थी।
फिल्म की कहानी युवा मंजूनाथ के इर्दगिर्द घूमती है। लखनऊ से आईआईएम में पढ़ाई के बाद मंजूनाथ ने एक तेल कंपनी के लिए काम करना शुरू किया। मंजूनाथ को जल्द ही समझ में आ गया कि तेल माफिया किस तरह से हेराफेरी और मिलावट कर रहे हैं। मंजूनाथ ने इन तेल माफियाओं का पर्दाफाश करने का निर्णय लिया।
तेल माफिया बेहद शक्तिशाली हैं। उन्होंने मंजूनाथ को धमकाया, लेकिन मंजूनाथ का इरादा इससे डगमगाया नहीं। आखिरकार उनकी आवाज को खामोश कर दिया गया। जब वे ड्यूटी पर थे, उनकी गोली मार कर हत्या कर दी गई। क्या मंजूनाथ का बलिदान केवल अखबारों की हेडलाइंस तक ही सीमित रहेगा? क्या मंजूनाथ की कहानी से सभी को सच का साथ देने की प्रेरणा मिलेगी?
लेखक के बारे में
समय ताम्रकर
समय ताम्रकर फिल्म समीक्षक हैं, जो फिल्म, कलाकार, निर्देशक, बॉक्स ऑफिस और फिल्मों से जुड़े पहलुओं पर गहन विश्लेषणात्मक लेख लिखते हैं।.... और पढ़ें