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बड़े लोग बड़े रहते हैं...
विनम्रता इसी को कहते हैं। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम देश के उन चंद व्यक्तियों में से हैं, जिन्हें विश्व के किसी भी हवाई अड्डे पर किसी भी तरह की तलाशी देने की जरूरत नहीं है। न्यूयॉर्क के जॉन एफ. कैनेडी हवाई अड्डे पर वे अड़ सकते थे कि तलाशी नहीं दूँगा। आखिरकार जीत उन्हीं की होती और कर्मचारियों को माफी भी माँगनी पड़ती, मगर डॉ. कलाम ने इसे कतई गंभीरता से नहीं लिया और उसी तरह तलाशी दे दी जिस तरह कोई आम आदमी तलाशी देता है। वे बिलकुल भी नाराज नहीं हुए। इससे उलट मामला शाहरुख खान का है। शाहरुख खान अपनी तलाशी से भड़क गए थे और अधिकारियों से भिड़कर उन्होंने अपनी मुसीबत और बढ़ा ली थी। याद रहे शाहरुख खान को तलाशी से छूट नहीं मिली हुई। अगर उन्हें ऐसी छूट मिली होती और फिर उनकी तलाशी होती तो वे आसमान सिर पर उठा लेते। दो बरस पहले भी कलाम की तलाशी हुई थी और उन्होंने कोई शिकायत नहीं की थी। इस बार भी वे खामोश हैं। जब कुछ पत्रकारों ने उनसे इस बाबत सवाल किए तो उन्होंने यही कहा कि इस मामले को तूल दिए जाने की जरूरत नहीं है। विनम्र आदमी ऐसा ही होता है। खामोख्वाह के टंटे खड़े नहीं करता। उलटे इस तरह की चीजों में सहयोग देता है। किसी का शेर है - ये अलग बात है, चुपचाप खड़े रहते हैं/ फिर भी जो लोग बड़े हैं, वो बड़े रहते हैं। मॉल वगैरह में प्रवेश से पहले आम लोगों की तलाशी होती है। इस तलाशी का मकसद उस चारदीवारी को हथियारों और गलत लोगों से सुरक्षित रखना होता है। कई लोगों का अहं इससे भी चोट खा जाता है कि हमारी तलाशी ली गई। हम क्या आतंकवादी दिखते हैं? ये कुतर्क है। अगर आतंकवादियों और गुंडे बदमाशों के सिर पर सींग होते तो वाकई किसी की तलाशी की जरूरत नहीं थी। मगर दिक्कत यह है कि आतंकवादी भी तो आम लोगों के भेस में आते हैं। ऐसे में किसी भी शरीफ आदमी का रवैया सुरक्षातंत्र को अधिकाधिक सहयोग करने का होना चाहिए। कलाम ने वही किया। शाहरुख ऐसा नहीं कर सके। शाहरुख और कलाम के मामलों में एक समानता यह है कि दोनों की तलाशी अमेरिकी अधिकारियों ने ली। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम की तलाशी दो बार ली गई। उनकी जैकेट और जूते तक उतरवा लिए गए। बाद में माफी भी माँग ली गई। इससे साबित यह होता है कि आतंकवादियों को रोकने के लिए अमेरिका की रणनीति क्या है। भले ही हमने अपने कुछ खास लोगों की लिस्ट बनाकर अमेरिका को दे रखी है कि अमुक-अमुक की तलाशी लिए जाने की जरूरत नहीं है, मगर फिर भी अमेरिकी अधिकारी जिसकी चाहे तलाशी ले ही लेते हैं। बाद में माफी माँग लेना भी उनकी रणनीति का हिस्सा है। हम-आप कुछ भी कहें मगर इन्हीं सब तरीकों को अपनाकर उन्होंने नौ ग्यारह के बाद अपनी धरती पर कुछ नहीं होने दिया। अमेरिका को कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन शाहरुख है और कौन अब्दुल कलाम। जो लोग शक के दायरे में आते हैं, उनकी पड़ताल वो करता ही है। भले ही हम कहें कि दूध का जला छाछ फूँक रहा है, पर उसे किसी के कहने की परवाह भी नहीं है।
लेखक के बारे में
दीपक असीम