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जब नेहरू ने दंगाइयों से लड़ने के लिए अपनी पिस्टल निकाल ली

Updated: मंगलवार, 14 नवंबर 2017 (12:57 IST)
- रेहान फ़ज़ल
बात 1947 की है। विभाजन के बाद सीमा के दोनों ओर इंसान, इंसान के ख़ून का प्यासा हो गया था। चाहे लाहौर हो या कोई और जगह, हत्या और लूट का तांडव मचा हुआ था। जवाहरलाल नेहरू को अचानक ख़बर मिली कि दिल्ली के कनॉट प्लेस में मुसलमानों की दुकानें लूटी जा रही हैं।
 
जब नेहरू वहाँ पहुंचे तो उन्होंने देखा कि पुलिस तो खड़ी तमाशा देख रही है और हिंदू और सिख दंगाई मुसलमानों की दुकान से औरतों के हैंडबैग, कॉस्मेटिक्स और मफ़लर ले कर भाग रहे हैं। नेहरू को इतना गुस्सा या कि उन्होंने पास खड़े एक सुस्त पुलिस वाले के हाथों से लाठी छीन कर दंगाइयों को दौड़ा लिया। बात यहीं ख़त्म नहीं हुई।
 
नेहरू के हाथ में रिवॉल्वर थी
पूर्व आईसीएस अधिकारी और कई देशों में भारत के राजदूत रहे बदरुद्दीन तैयबजी अपनी आत्मकथा 'मेमॉएर्स ऑफ़ एन इगोइस्ट' में लिखते हैं, "एक रात मैंने नेहरू के घर पहुंच कर उन्हें बताया कि पुरानी दिल्ली से शरणार्थी शिविर पहुंचने की कोशिश कर रहे मुसलमानों को मिंटो ब्रिज के आस-पास घेर कर मारा जा रहा है।"
 
बदरुद्दीन तैयबजी ने लिखा है, "ये सुनते ही नेहरू तमक कर उठे और तेज़ी से सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर चले गए। थोड़ी देर बाद जब वो उतरे तो उनके हाथ में एक पुरानी, धूल से भरी एक रिवॉल्वर थी। दरअसल ये रिवॉल्वर उनके पिता मोतीलाल की थी, जिससे सालों से कोई गोली नहीं चलाई गई थी।"
 
दूसरी सबसे बड़ी आबादी
तैयबजी लिखते हैं, "उन्होंने मुझसे कहा कि हम लोग गंदे और पुराने कुर्ते पहन कर रात को मिंटो ब्रिज चलेंगे। हम ये दिखाएंगे कि हम भी भाग रहे मुसलमान हैं। अगर कोई हम पर हमला करने की कोशिश करेगा तो हम उसे गोली से उड़ा देंगे। मैं नेहरू की ये बात सुन कर हक्काबक्का रह गया। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश के प्रधानमंत्री को ये समझाने में मुझे एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ा कि इस तरह के अपराध से निपटने के और भी बेहतर तरीके हैं।"
 
माउंटबेटन को हमेशा इस बात का डर लगा रहता था कि नेहरू का इस तरह का आवेश एक दिन उनकी मौत का कारण बन सकता है। इसलिए उन्होंने की निगरानी के लिए कुछ सैनिक लगा रखे थे।
 
बिना सुरक्षा गार्ड ज़ाकिर हुसैन को बचाने निकले
इसी तरह आज़ादी से कुछ दिन पहले नेहरू के एक सहयोगी मोहम्मद यूनुस के पास जामिया मिलिया इस्लामिया के प्रधानाध्यापक डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन का रात 11 बजे बहुत घबराहट में फ़ोन आया। बाद में डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन भारत के तीसरे राष्ट्रपति बने। उस समय यूनुस नेहरू के निवास में ही ठहरे हुए थे।
 
ज़ाकिर हुसैन ने उन्हें बताया कि दंगाइयों की बड़ी भीड़ इस समय कॉलेज के बाहर जमा हो रही है और उन्हें उनके इरादे नेक नहीं लगते।
 
मोहम्मद यूनुस अपनी किताब 'परसन्स, पैशंस एंड पॉलिटिक्स' में लिखते हैं, "फ़ोन सुनते ही मैं नेहरू के पास दौड़ता हुआ गया। उस समय भी वो अपने दफ़्तर में काम कर रहे थे। जैसे ही मैंने उन्हें सारी बात बताई, उन्होंने अपनी कार मंगवाई और मुझे भी उसमें बैठने के लिए कहा। कार में उनके साथ कोई गार्ड नहीं था। जब हम जामिया पहुंचे तो हमने वहाँ देखा कि डरे हुए छात्रों और कर्मचारियों ने भवन के अंदर शरण ले रखी है और उसको हिंसा पर उतारू भीड़ ने घेर रखा है।"
 
मोहम्मद यूनुस आगे लिखते हैं, "जैसे ही नेहरू वहाँ पहुंचे, भीड़ ने उन्हें पहचान कर उन्हें घेर लिया। नेहरू ने बिना वक्त गंवाए उन पर उनके व्यवहार के लिए चिल्लाना शुरू कर दिया। कुछ ही मिनटों में उन्हें अपनी ग़लती का अहसास हो गया और वो नेहरू से माफ़ी मांगने लगे। नेहरू ने जामिया के प्रांगण में घुस कर ज़ाकिर साहब को ढांढस बंधाया। इस बीच नवनियुक्त वायसराय माउंटबेटन तक ख़बर पहुंच गई कि नेहरू बिना किसी सुरक्षा के नाराज़ भीड़ के सामने चले गए हैं। उन्होंने तुरंत कुछ जीपों में मशीन गन फ़िट करा कर अपने बॉडी गार्ड नेहरू की सुरक्षा के लिए भेज दिए। जब ये लोग वहाँ पहुंचे तो उन्होंने नेहरू को लोगों से घिरा पाया। उससे पहले कि कोई अनहोनी होती, उन्हें नारे सुनाई दिए, "जवाहरलाल नेहरू ज़िंदाबाद!"
 
नेहरू कभी नहीं रोते
नेहरू के भतीजे और अमरीका में राजदूत रहे बीके नेहरू ने 1935 में एक हंगेरियन लड़की फ़ोरी से शादी की थी। शादी से पहले वो उनको अपने परिवार से मिलाने आनंद भवन ले गए। वो खद्दर पहनने वाले पूरे परिवार से मिल कर बहुत खुश हुईं। लेकिन नेहरू उस समय कलकत्ता की अलीपुर जेल में बंद थे। बीके नेहरू उनसे अपनी भावी पत्नी को मिलवाने कलकत्ता ले गए।
 
फ़ोरी जब जेल में नेहरू से मिली तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि ये निहायत ही शरीफ़, स्नेही और अंग्रेज़ों की तरह लगने वाला शख़्स कोई क़ानून भी तोड़ सकता है। जब नेहरू से विदा लेने का समय आया तो फ़ोरी अपने आँसू नहीं रोक पाईं। नेहरू को अपने परिवार को महीने में सिर्फ़ एक बार पत्र लिखने की इजाज़त थी।
 
बीके नेहरू अपनी आत्मकथा 'नाइस गाइज़ फ़िनिश सेकेंड' में लिखते हैं, "अगले महीने जब नेहरू के ख़तों का लिफ़ाफ़ा आनंद भवन आया तो उनमें एक पत्र फ़ोरी के लिए भी था। उसमें उन्होंने लिखा था, अब चूँकि तुम नेहरू परिवार की सदस्य बनने ही जा रही हो, तो तुम्हें नेहरू परिवार के कुछ क़ायदे क़ानून भी सीखने होंगे। मैंने देखा था कि जब तुम मुझसे मिल कर जा रही थी तो तुम्हारी आँखों में आँसू थे। एक बात याद रखो। चाहे जितना बड़ा दुख हो, नेहरू कभी रोते नहीं! उसी लिफ़ाफ़े में एक पत्र इंदिरा गांधी के लिए भी था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि उन्हें परिवार की नई बहू बहुत पसंद आई।"
 
प्रोटोकॉल? व्हाट प्रोटोकॉल?
अप्रैल, 1949 में बर्मा के पहले प्रधानमंत्री यू नू अचानक भारत की यात्रा पर दिल्ली पहुंचे। उस दिन रविवार था। उस समय विदेश मंत्रालय में एक अधिकारी वाई डी गुंडेविया जो बाद में भारत के विदेश सचिव बने, शार्ट्स पहने तैरने के लिए जिमखाना क्लब जाने के लिए अपनी कार में बैठ ही रहे थे कि उनके घर के फ़ोन की घंटी बजी।
 
दूसरे छोर पर नेहरू के सचिव एवी पाई थे। वो बोले, "प्रधानमंत्री आपसे तुरंत मिलना चाहते हैं।" गुंडेविया ने अपनी पत्नी से आधे घंटे इंतज़ार करने के लिए कहा और उन्हीं कपड़ों में बैठकर नेहरू से मिलने साउथ ब्लॉक रवाना हो गए।
 
गंडेविया अपनी किताब 'आउट साइड द आर्रकाइव्स' में लिखते हैं, "जैसे ही मैं नेहरू के कमरे में घुसा, नेहरू हंसते हुए बोले, कहाँ जा रहे हो? तुम हवाई अड्डे क्यों नहीं गए? मुझे तब अहसास हुआ कि मैं शार्ट्स, बुशर्ट और हवाई चप्पल पहने हुए हूँ और मेरी बग़ल में तौलिया दबा हुआ है। मैंने बहुत मासूमियत से कहा कि मैं तो तैरने जा रहा था। नेहरू ने कहा कि तुम यू नू को रिसीव करने पालम नहीं जा रहे? वो अगले एक घंटे में वहाँ उतरने वाले हैं। मैंने कहा मुझे प्रोटोकॉल ने बताया कि मेरी वहाँ ज़रूरत नही होगी। नेहरू गरजे प्रोटोकॉल? व्हाट प्रोटोकॉल? तुम ही अकेले आदमी हो जो यू नू से मिल चुके हो। मेरे साथ कार में बैठो और पालम चलो।"
 
गुंडेविया आगे लिखते हैं, "मैंने अपनी नंगी टाँगों और चप्पलों को देखते हुए नेहरू से पूछा, इसी हालत में? नेहरू ने कहा ऐसे ही। उन्होंने अपने कमरे का दरवाज़ा खोला और हम दोनों तेज़ी से एक एक सीढ़ियाँ मिस करते हुए नीचे उतरे और नेहरू की कार में सवार हो गए। जब मैं नेहरू के साथ हवाई अड्डे पर पहुंचा तो वहाँ मौजूद लोगों के चेहरे पर आश्चर्य के भाव मैं साफ़ पढ़ सकता था। यू नू को नेहरू से मिलवाने के बाद मैं दूसरी कार से घर वापस आ गया। किसी ने इस बात पर चूँ भी नहीं की कि जिस कार में दो प्रधानमंत्री सफ़र करने वाले थे, उसकी पिछली सीट पर मेरा स्वीमिंग ट्रंक और तौलिया पड़ा हुआ था। अगले दिन मेरी मेज़ पर एक पार्सल रखा हुआ था जिसमें करीने से तय किया गया मेरा तौलिया और ट्रंक रखे हुए थे।"
 
नेहरू और एडवीना का इश्क
नेहरू एडवीना माउंटबेटन को बहुत पसंद करते थे। कुछ हलकों में कहा जाता है कि उन्हें उनसे इश्क था। 1949 में नेहरू पहली बार राष्ट्रमंडल शिखर सम्मेलन में भाग लेने लंदन पहुंचे। उस समय खुशवंत सिंह भारतीय उच्चायोग में जनसंपर्क अधिकारी हुआ करते थे। एक दिन जब वो अपने दफ़्तर पहुंचे तो अपनी मेज़ पर भारतीय उच्चायुक्त कृष्णा मेनन का एक नोट लिखा हुआ मिला, जिस पर लिखा था, 'मुझसे तुरंत मिलो।'
 
खुशवंत सिंह अपनी आत्मकथा 'ट्रूथ, लव एंड लिटिल मेलिस' में लिखते हैं, "जाने से पहले मैंने सोचा कि कुछ अख़बारों पर नज़र मार लूँ कि कहीं नेहरू के बारे में कुछ ग़लत सलत तो नहीं छप गया है? मैंने देखा कि डेली हैरल्ड के पहले ही पन्ने पर नेहरू और लेडी माउंटबेटन की एक बड़ी तस्वीर छपी है जिसमें वो नाइटी पहने नेहरू के लिए अपने घर का दरवाज़ा खोलती दिखाई दे रही हैं। उसके नीचे कैप्शन लिखा था, "लेडी माउंटबेटन्स मिड नाइट विज़ीटर।"
 
वो लिखते हैं, "उस ख़बर में ये भी बताया गया था कि उस समय लॉर्ड माउंबेटन लंदन में मौजूद नहीं थे। जैसे ही मैं मेनन के कमरे में पहुंचा, वो मुझ पर चिल्लाए, तुमने आज का हैरल्ड देखा? प्रधानमंत्री तुमसे बहुत नाराज़ हैं। मैंने कहा मेरा इससे कोई लेनादेना नहीं। मुझे क्या पता था कि प्रधानमंत्री हवाई अड्डे से सीधे अपने होटल जाने के बजाए लेडी माउंटबेटन के घर पहुंच जाएंगे?"
 
एडवीना को ग्रीक रेस्तरां में ले गए
ख़ुशवंत सिंह आगे लिखते हैं, "मैं दो दिन तक नेहरू के सामने नहीं पड़ा। फिर वो सम्मेलन में इतने वयस्त हो गए कि भूल ही गए कि क्या कुछ हुआ था। लेकिन भारत लौटने से दो दिन पहले उन्होंने सोहो के एक ग्रीक रेस्तरां में लेडी माउंटबेटन को खाने पर बुलाया। रेस्तरां के मालिक ने उन्हें पहचान लिया और अपने रेस्तरां का प्रचार करने के लिए प्रेस को फ़ोन कर दिया। अगले दिन अख़बारों में दोनों की साथ साथ बैठे तस्वीर छपी। मैं समझ गया कि मेरी फिर शामत आने वाली है।"
 
उन्होंने लिखा, "जब मैं अपने दफ़्तर पहुंचा तो मेरी मेज़ पर फिर मेनन का एक नोट पड़ा हुआ था, जिसमें लिखा था कि प्रधानमंत्री मुझसे तुरंत मिलना चाहते हैं। मैं क्लैरिजेस होटल पहुंचा और नेहरू के सचिव मथाई से मिला। मथाई ने मुझे कमरे के अंदर जाने के लिए कहा। मैंने जैसे उनके दरवाज़े पर नौक किया, वो बोले, "यस?" मैंने कहा, "आपने मुझे बुलाया है।" नेहरू ने कहा, "आप हैं कौन?" मैंने कहा, "मैं लंदन में आपका पीआरओ हूँ।" नेहरू ने मुझे ऊपर से नीचे तक देख कर कहा, "आपका पब्लिसिटी का अंदाज़ बड़ा अजीब है!"
 
ब्रीफ़ केस चलता था साथ
जब भी नेहरू भारत में कहीं दौरे पर जाते थे, उनके साथ एक ब्रीफ़ केस चलता था, जो उनके सुरक्षा अधिकारी के एफ़ रुस्तमजी के हाथ में होता था। दरअसल नेहरू की अचकन में कोई जेब नहीं होती थी। इसलिए जेब में रखी जाने वाली कुछ चीज़े ब्रीफकेस में रखी जाती थीं।
 
रुस्तमजी अपनी किताब "आई वाज़ नेहरूज़ शैडो" में लिखते हैं, "ब्रीफ़ केस में उनका सिगरेट का डिब्बा (स्टेट एक्सप्रेस 555), दियासलाई, एक किताब जिसे वो उस समय पढ़ रहे होते थे, एक या दो निजी पत्र जिनका उन्हें उस दौरे के दौरान जवाब देना होता था, ख़राब गले के लिए सुक्रेट्स का एक पैकेट और किताबों पर निशान लगाने के लिए कुछ पैंसिलें रहती थीं। नेहरू का एक निर्देश ये भी था कि वो जहाँ भी जाएं, उनकी बरसाती उनके साथ जाए।"
 
फ़िज़ूलखर्ची के सख़्त ख़िलाफ़
नेहरू फ़िज़ूलखर्ची बिल्कुल पसंद नहीं करते थे। अगर वो अपने घर से निकल रहे हों और उन्हें कोई नल खुला दिखाई दे जाए, तो वो कार रुकवा कर ड्राइवर को वो नल बंद करवाने के लिए भेजते थे। रुस्तमजी लिखते हैं, "एक बार मैंने सऊदी अरब की राजधानी रियाद में उनके लिए ख़ास तौर से बनवाए गए महल में अपने हाथों से कमरों की बत्तियाँ बुझाते हुए देखा था।"
 
उसी यात्रा का ज़िक्र करते हुए मोहम्मद यूनुस अपनी किताब में लिखते हैं, "नेहरू सोते समय कुछ पढ़ना चाह रहे थे। इसलिए उन्होंने मांग की कि उनके लिए एक टेबल लैंप का इंतज़ाम किया जाए। उनके अटेंडेंट ने समझा कि शायद कमरे में रोशनी की कमी है, इसलिए वो उनके लिए और ज़्यादा रोशनी वाला लैंप ले आया। उसकी रोशनी को कम करने के लिए मुझे उसे एक तौलिए से ढ़कना पड़ा, लेकिन उसकी गर्मी ने उस तौलिए को भी करीब करीब जला डाला।"

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