अविगडोर लिबरमन: अरब लोगों के ख़िलाफ़ ‘ज़हर’ उगलने वाला इसराइल का ‘किंगमेकर’

पुनः संशोधित शुक्रवार, 20 सितम्बर 2019 (14:01 IST)
हरिंदर मिश्रा, येरुशलम से
के आम चुनाव में किसी को स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में किंगमेकर के रूप में उभरे नेता बहुतों के लिए एक पहेली बने हुए हैं। पर लिबरमन इसराइली राजनीति के मंच पर कोई नया नाम नहीं है।
 
वो लगभग पिछले 20 सालों से सांसद या मंत्री रहे हैं और इस दौरान कई प्रभावशाली मंत्रालयों का नेतृत्व कर चुके हैं। वो अक्सर अपने विरोधी बयानों की वजह से विवादों में भी घिरे रहे हैं और उनकी गिनती बेहद विवादास्पद नेताओं में होती है।
 
मौजूदा हालात में इसराइल में उनको लेकर सबसे अहम सवाल जो उठाया जा रहा है वो ये है कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के एक वक़्त वफ़ादार दाहिना हाथ माने जाने वाले लिबरमन आख़िर कैसे उनके रास्ते का कांटा बन गए और अब उनके राजनीतिक करियर को ख़त्म करने की कोशिश में जुट गए हैं।
 
लिबरमन ने नौ अप्रैल के आम चुनाव के बाद नेतन्याहू के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार में शामिल होने से इनकार कर दिया था जिसकी वजह से 17 सितम्बर को दोबारा चुनाव करवाने पड़े। इस चुनाव के बाद कुछ ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है कि माना जा रहा है कि लिबरमन तय करेंगे कि किसकी सरकार बने।
 
नेतन्याहू के नेतृत्व वाली दक्षिणपंथी पार्टियों के समूह को 120 सदस्यों वाली संसद में 55 सीटें मिली हैं वहीं विपक्षी पार्टियों को कुल 57 सीटें प्राप्त हुई हैं। लिबरमन की इसराइल बेतेनु पार्टी को 8 सीटें मिली हैं और वो जिस समूह का साथ देंगे उसकी सरकार बनेगी।
 
फ़िलहाल उन्होंने किसी का भी साथ देने से इनकार किया है और एक राष्ट्रीय एकता की सरकार बनाने की मांग की है, जिसमें उनकी पार्टी के अलावा दो सबसे बड़ी पार्टियां, लिकुड और ब्लू एंड वाइट, शामिल हों।
 
कभी नेतन्याहू के थे सबसे क़रीबी : इसराइल में भी बहुत कम लोग ये जानते हैं कि किसी समय नेतन्याहू और लिबरमन की जोड़ी अविभाज्य थी। नेतन्याहू जब लिकुड पार्टी के उभरते सितारे थे तब लिबरमन उनके सबसे विश्वसनीय साथी थे और नेतन्याहू को शीर्ष तक पहुंचाने में उनकी अहम भूमिका रही।
 
लिबरमन ने नेतन्याहू के पहले प्रधानमंत्री काल के दौरान उनके दफ्तर में डायरेक्टर जनरल का पद भी संभाला और सबसे प्रभावशाली लोगों में उनकी गिनती थी। 61 वर्ष के लिबरमन 1978 में सोवियत संघ के माल्डोवा क्षेत्र से इसराइल आए और उनका परिवार पश्चिम तट की नोकदीम बस्ती में रहता है। एक लम्बे समय तक लोग उन्हें एवेत के नाम से जानते थे, मगर उन्होंने बाद में अपना नाम बदलकर एक हिब्रू नाम अपना लिया, अविगडोर।
 
नेतन्याहू के राजनीति में प्रवेश के पहले से ही लिबरमन लिकुड पार्टी में कार्यरत थे। वह 1980 के दशक की शुरुआत में येरुशलम के हिब्रू विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान पार्टी में शामिल हुए, जहां उन्होंने अरब छात्रों के ख़िलाफ़ अक्सर हिंसक दक्षिणपंथी विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया।
 
वह लिकुड पार्टी के नेता मोशे आर्न्स का समर्थन करने वाले 'आर्न्स कैंप' में सक्रिय थे, जिनका व्यापक रूप से पार्टी के अगले नेता बनने की उम्मीद थी। 20 साल की उम्र में अपने माता-पिता के साथ तत्कालीन सोवियत संघ से विस्थापित लिबरमन में शुरू से ही राजनीति में अपने को स्थापित करने की होड़ रही।
 
मोशे आर्न्स, जो की विदेश मंत्री रहे, उनका लिबरमन ने ज़ोर-शोर से समर्थन किया और उनके पक्ष में रैलियां निकालीं। मगर ये मेहनत रंग नहीं लाई और वो सही अवसर की तलाश में बने रहे।
 
नेतन्याहू के राजनीति में आने से मिली दिशा : ये अवसर उन्हें तब मिला जब एक होनहार नवयुवक ने 1988 में संयुक्त राष्ट्र संघ में इसराइल के राजदूत पद से इस्तीफ़ा देकर राजनीति में उतरने का फ़ैसला किया। ये कोई और नहीं बल्कि नेतन्याहू थे जिन्होंने इसराइली नीतियों का संयुक्त राष्ट्र संघ में बख़ूबी बचाव करके अपने जनमानस के दिल में जगह बना ली थी।
 
मगर चुनावी मैदान में उसे विश्वसनीय लोगों की ज़रूरत थी जिसकी भरपाई लिबरमन ने की। जी तोड़ मेहनत के बाद इस जोड़ी ने नेतन्याहू के लिए लिकुड की सूची में शीर्ष पर स्थान निश्चित किया।
 
इस दौरान एक और महत्वपूर्ण घटना हुई जिसने लिबरमन की न सिर्फ़ अहमियत बढ़ाई बल्कि उनके आज की सफलता का मार्ग खोला। 1991 में सोवियत संघ का विघटन हुआ और तकरीबन 10 लाख यहूदी वहां से इसराइल आए। आज की तारीख़ में विघटित सोवियत संघ से आए रूसी मूल के लोगों की इसराइल में आबादी तकरीबन 20 प्रतिशत है और ये ही लिबरमन के राजनीतिक सफलता का मुख्य कारण है।
 
लिबरमन आज भी इसराइल के मूल निवासियों की तरह हिब्रू नहीं बोलते और उनकी बोली पर रूसी भाषा का गहरा असर है। मगर उनके राजनीतिक करियर पर इसका कोई विपरीत असर नहीं पड़ा। अपने अति विवादास्पद वक्तव्यों की वजह से उन्होंने अरबों से नफ़रत करने वाले कुछ चरमपंथी यहूदियों के मन में भी अपने लिए जगह बना ली है।
 
नेता की पसंद का कपड़ा पहनते थे : कड़े परिश्रम के बाद भी मोशे आर्न्स से उन्हें ज़्यादा मदद नहीं मिली और लिबरमन लिकुड पार्टी वर्कर्स यूनियन में एक निम्न स्तरीय पद ही अपने लिए जुटा पाए। मगर इसी दौरान उन्होंने अपना पूरा ध्यान नेतन्याहू की और केंद्रित किया।
 
कुछ लोग बताते हैं कि लिबरमन चुनावी सभा के पहले निर्धारित जगह पर पहुंच जाया करते थे और अपने नेता की पसंद का कपड़ा तक आइरन करवाकर तैयार रखते थे। उन्होंने नेतन्याहू के लिए रूसी मूल के लोगों में समर्थन जुटाया और उन्हें लिकुड पार्टी में भी शामिल करवाया।
 
वो याददाश्त के बेहद तेज़ माने जाते हैं और उन्होंने समर्थकों की पूरी सूची बना रखी थी। अब बस सही समय का इंतज़ार था। ये अवसर तब आया जब 1993 में लिकुड पार्टी में पहली बार प्राइमरीज़ हुए और सभी पार्टी के सदस्यों ने अपना अध्यक्ष चुनने के लिए वोट दिया। लिबरमन के वर्षों की मेहनत काम आई और उन्होंने अब तक स्थापित संपर्क का नेतन्याहू के पक्ष में इस्तेमाल किया। नेतन्याहू पार्टी के अध्यक्ष चुने गए और लिबरमन को पार्टी का सीईओ बनाया गया।
 
पहली बार राजनीति में उन्हें बेहद अहम कार्यभार मिला और उन्होंने इसे बखूबी निभाया। पार्टी गहरे आर्थिक समस्या से जूझ रही थी। बताया जाता है की लिबरमन ने कठिन परिश्रम के ज़रिये पार्टी को संकट से निकाला।
 
नेतन्याहू ने भी इस दौरान अपने कूटनीतिक जीवन के दौरान अमेरिका में बनाए संबंधों का उपयोग करते हुए पार्टी के लिए काफ़ी पैसा इकट्ठा किया। अब नेतन्याहू और लिबरमन की जोड़ी अगली चुनौती के लिए तैयार थी। 
 
इसराइल में प्रधानमंत्री पद के लिए सीधे चुनाव करवाने का क़ानून पास हो गया था। नेतन्याहू ने अपनी पार्टी का विरोध करते हुए इस प्रस्ताव का समर्थन किया था। उन्हें उम्मीद थी की एक दिन वो लिकुड पार्टी के उम्मीदवार होंगे और पार्टी के शीर्ष नेताओं के हट जाने के बाद 1996 में उन्हें ये मौका हाथ लगा।
 
इसराइल के प्रधानमंत्री इट्ज़हैक रॉबिन की हत्या किए जाने के बाद लिकुड पार्टी का उम्मीदवार होकर प्रधानमंत्री पद के लिए चुनाव लड़ना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने से कम नहीं था। मगर नेतन्याहू ने जुर्रत की और लिबरमन के कुशल मैनेजमेंट के बदौलत एक निश्चित हार को जीत में बदल दिया।
 
नेतन्याहू-लिबरमन के रिश्तों में कैसे पड़ी दरार : 1996 में जब नेतन्याहू पहली बार प्रधानमंत्री बने तब लिबरमन ने उनके कार्यालय में डायरेक्टर जनरल के अहम पद को संभाला। 18 महीनों तक लिबरमन प्रधानमंत्री कार्यालय के सबसे अहम पद पर कार्यरत रहे मगर उसके बाद अविभाज्य मानी जाने वाली इस जोड़ी में खटास आ गई।
 
नेतन्याहू ने लिबरमन पर ग़लत सलाह देकर उनकी सरकार को असफल बनाने का इलज़ाम लगाया तो लिबरमन ने नेतन्याहू को कड़े फ़ैसले लेने में असक्षम नेता बताया।
 
लिबरमन ने प्रधानमंत्री कार्यालय से निकलने के बाद व्यापार का रुख़ किया और माना जाता है कि उन्होंने बहुत धन अर्जित किया। ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से धन अर्जित करने के भी उन पर आरोप लगे जिसकी वजह से उन्हें लम्बे वक़्त तक पुलिस की जांच से भी गुज़रना पड़ा।
 
मगर 1999 में वह फिर राजनीति के मंच पर उतरे तो अपनी नयी पार्टी के ज़रिये, जो तब से अब तक उनकी ही मिल्कियत मानी जाती है और उसका प्रभाव इसराइली राजनीति में कभी कम नहीं हुआ।
 
किंग नहीं बल्कि किंगमेकर बनने की इच्छा : लिबरमन और नेतन्याहू के बीच अगर कुछ खटास पैदा हुई तो भी दोनों ने ही इसे अलग करके पिछले 20 सालों के दौरान कुछ हद तक एक दूसरे का साथ भी दिया है। नेतन्याहू की सरकार में लिबरमन विदेश और रक्षा मंत्री रहे। रक्षा मंत्री के पद से उन्होंने नेतन्याहू के साथ वैचारिक मतभेद की वजह से इस्तीफ़ा दिया था।
 
वैसे लिबरमन ने पिछले 20 वर्षों के दौरान कई महत्वपूर्ण मंत्री पद संभाले मगर लगभग हर बार वो किसी नैतिक पहलू का बहाना बनाकर इस्तीफ़ा देते रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि लिबरमन की ये सोची समझी चाल है जो की अक्सर कामयाब रही है।
 
इस तरह वो लोगों में पद का लोभी न होने का संदेश देते रहते हैं मगर हक़ीक़त में उनकी चाहत हमेशा किंगमेकर बनकर पॉवर के गलियारों में प्रभावशाली बने रहने की होती है। उनकी इसराइल बेतेनु पार्टी अक्सर सरकार में तब शामिल होती रही है जब गठबंधन कमज़ोर हो गया होता है। इसका उन्हें पूरा लाभ मिलता है और ये देखा गया है की वो हमेशा ऐन वक़्त पर सरकार से कोई न कोई नैतिक सवाल उठाकर बाहर होते रहे हैं।
 
नौ अप्रैल, 2019 को इसी तरह जब उन्होंने अल्ट्रा-रूढ़िवादी यहूदियों को सैन्य सेवा से मुक्ति के सवाल पर नेतन्याहू की सरकार में शामिल होने से मना किया तो विश्लेषकों ने उनकी नीयत पर सवाल उठाया।
 
अगर लिबरमन इस तबके के लोगों की राजनीति का विरोध करते हैं तो पहले कई बार वो उनके साथ हाथ मिलाकर चुनाव में साथ रहे हैं उसका क्या औचित्य हो सकता है? ऐसे में सिर्फ़ एक ही जवाब सामने आता है। क्या वो नेतन्याहू से अपना पुराना बैर चुकता कर रहे हैं?
 
हाल ही में नेतन्याहू की बायोग्राफी लिख चुके पत्रकार अनशेल फेफर का कहना है कि लिबरमन के मन में हमेशा ही नेतन्याहू को सबक सिखाने की कामना रही है। वो बस सही वक़्त का इंतज़ार कर रहे थे। शायद वो अवसर उन्हें अब मिला है और नेतन्याहू को शीर्ष पर पहुंचाने वाले लिबरमन ही उन्हें शून्य पर लाने वाले भी साबित हो सकते हैं। लिबरमन अक्सर अरब आबादी के ख़िलाफ़ ज़हर उगलने के लिए भी ख़बरों में बने रहते हैं।
 
उन्होंने अरब आबादी के ट्रांसफ़र, ग़द्दार अरब नेताओं को ख़त्म करने की पेशकश से लेकर हमास के नेता इस्माइल हनिये को मौत के घाट उतारने तक की बात की है। मगर इन सबके बीच उन्हें एक प्रैगमैटिक नेता के रूप में भी देखा जाता है क्योंकि पश्चिम तट की नोकदीम बस्ती, जहां वो रहते हैं, अगर उससे भी फ़लस्तीनियों के साथ ज़मीन की अदला-बदली द्वारा समस्या का समाधान निकले तो उनका कहना है कि वो उससे पीछे नहीं हटेंगे।
 

और भी पढ़ें :