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भूल गए!
दिनेश सिंह
जाने कैसे हुआकि प्रिय की पाती पढ़ना भूल गएदाएँ-बाएँ की भगदड़ मेंआगे बढ़ना भूल गएनित फैशन कीनए चलन कीरोपी फसल अकूते धन कीवैभव की खेती-बारी मेंमन को गढ़ना भूल गएना मुड़ने कीना जुड़ने कीजिद ऊपर-ऊपर उड़ने कीऊँचाई की चिंताओं मेंसीढ़ी चढ़ना भूल गएहम ही हम हैंकिससे कम हैंसूर्य-चन्द्र अपने परचम हैंफूटी ढोल बजाते रहतेफिर से मढ़ना भूल गए।