श्याम बेनेगल का मयूरपंखी फिल्म-सफर

Bhumika
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बेनेगल के आरंभिक निर्देशकीय करियर की एक चर्चित फिल्म 'भूमिका' (1977) मराठी रंगमंच की ख्यात अदाकार हंसा वाडकर के जीवन पर आधारित थी। स्मिता पाटिल, अमरीश पुरी, नसीर, अनंत नाग, कुलभूषण खरबंदा अभिनीत इस फिल्म का निर्माण ब्लेज एडवरटाइजिंग एजेंसी के बैनर तले किया गया।

अपने शराबी पिता और तानशाह परिवार की गिरफ्त से छूटकर उषा गायिका और अभिनेत्री बनती है और व्यापार में घाटा उठा रहे केशव से शादी कर लेती है। उसकी जिंदगी में राजन काले और सुनील वर्मा जैसे अन्य पुरुष भी आते हैं। पति के शक्की मिजाज और फिल्म जगत के चतुर-चालाक लोगों की संगत के फलस्वरूप उषा भी एक सयानी महिला बन अंततः एकाकी जीवन गुजारने का फैसला करती है।

'भूमिका' को सर्वश्रेष्ठ फिल्म और अभिनेत्री के राष्ट्रीय अवार्ड के अल्जीरिया में आयोजित फेस्टिवल ऑफ इमेज ऑफ वूमन हेतु आमंत्रित किया गया। इस विवादास्पद फिल्म को भारत में नारीवादी आंदोलन की प्रतिनिधि कृति के बतौर देखा गया।

अभिनेता शशिकपूर के साथ श्याम की मित्रता के फलस्वरूप दो उल्लेखनीय फिल्में 'जुनून' और 'कलयुग' का निर्माण हुआ। रस्किन बांड की कहानी पर आधारित 'जुनून' (1978) 1857 के सिपाही विद्रोह की पृष्ठभूमि में फिल्माई गई। उत्तर भारत के एक इलाके में पठान जावेद खान की नजर अंगरेज युवती रूथ पर है, जो अपनी माँ के साथ सैन्य छावनी में रहती है। जावेद उसे अपनी दूसरी पत्नी बनाना चाहता है, जिसके लिए उसकी पहली पत्नी तैयार नहीं। इसी बीच दिल्ली में सिपाही बगावत की खबरें मिलती हैं।

क्रांति की थल-पुथल में रूथ जावेद की नजरों से दूर हो जाती है। जावेद इस बगावत में शामिल होने के प्रति अनिच्छा दर्शाता है, जबकि पूरा देश इस क्रांति की गिरफ्त में है। आखिर जावेद के एक जंग में मारे जाने की खबर मिलती है और रूथ अविवाहित रहकर इंग्लैंड चली जाती है।

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1975 में श्याम ने एक बाल फिल्म 'चरणदास चोर' बनाई, लेकिन उनका मूल लक्ष्य अगले वर्ष अर्थात 1976 में पूरा हुआ, जब उन्होंने राय की तरह अपनी सिने-त्रयी का निर्माण किया। अंकुर और निशांत के बाद मंथन इसकी तीसरी कड़ी थी। उनकी इस फिल्म का प्रसारण चीन के राष्ट्रीय टेलीविजन नेटवर्क पर किया गया।
'मंथन' गुजरात के विश्व चर्चित दुग्ध सहकारिता आंदोलन के जनक डॉ. वर्गीस कुरियन के जीवन से प्रेरित थी। गुरात के दूरस्थ गाँव में डॉ. राव (गिरीश कर्नाड) दुग्ध सहकारिता संघ की स्थापना करना चाहते हैं, ताकि छोटे उत्पादकों को भी लाभ पहुँचे। इससे बड़े दुग्ध उत्पादक और दलाल जैसे मिश्राजी (अमरीश पुरी) खफा हो जाते हैं और साजिश रचते हैं। डॉ. राव एक ग्रामीण महिला बिंदू (स्मिता पाटिल) की ओर आकर्षित है। बिन्दू का पति मिश्रा के उकसाने पर डॉ. राव को षड्यंत्र का शिकार बनाने में सहयोग करता है। समूचा दुग्ध आंदोलन एक साजिश का शिकार बनता नजर आता है, मगर अंततः एक अस्पृश्य गरीब व्यक्ति भोला (नासीर) अपने साथी मोती के साथ मिलकर इस आंदोलन की ज्योति जगाए रखने में सफल होता है। फिल्म में वनराज भाटिया का संगीत और विशेषकर गीत 'म्हारो गाँव काठियावाड़' बेहद लोकप्रिय हुआ। मंथन के लिए दुग्ध उत्पादकों से वित्त जुटाने का सुझाव डॉ. कुरियन का था। इस फिल्म का सामूहिक अवलोकन यूएनडीपी (संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम) के द्वारा आयोजित किया गया। दरअसल मंथन विकासशील देशों के जमीनी परिवर्तन का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसलिए इसे तृतीय सिनेमा की प्रतिनिधि कृति भी निरूपित किया गया। फिल्म को सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फिल्म के राष्ट्रीय अवॉर्ड के अलावा अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह से आमंत्रण भी प्राप्त हुआ। मंथन के साथ ही बेनेगल की चर्चित ग्रामीण सिने-त्रयी पूरी हुई।
'जुनून' में शशि के साथ उनकी पत्नी जैनिफर कैंडल ने भी काम किया था। इस फिल्म को वर्ष 1979 में सर्वश्रेष्ठ फिल्म, छायांकन और ध्वनि संयोजन के राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया। शशि और बेनेगल की सहभागिता उनकी दूसरी फिल्म कलयुग (1981) में भी नजर आई, जो दो चचेरे भाइयों की पारिवारिक और व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता पर आधारित थी। मॉस्को फिल्मोत्सव में प्रदर्शित 'कलयुग' में शशिकपूर के अलावा बांग्ला अभिनेता विक्टर बैनर्जी की प्रमुख भूमिका थी। 'कलयुग' में कुछ हद तक बेनेगल ने व्यावसायिक सिनेमा के तटों को छूने की असफल कोशिश की।


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