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जब सजी वसंती बाने में,
बहनें जौहर गाती होंगी,
कातिल की तोपें उधर,
इधर नवयुवकों की छाती होगी,
तब समझूंगा आया वसंत!
जब पतझड़ पत्तों से विनष्ट
बलिदानों की टोली होगी,
जब नवविकसित कोपल-कर में
कुमकुम होगा, रोली होगी,
तब समझूंगा आया वसंत!
युग-युग से पीड़ित मानवता,
सुख की सांसें भरती होगी,
जब अपने होंगे वन-उपवन
जब अपनी यह धरती होगी,
तब समझूंगा आया वसंत!
जब विश्व प्रेम मतवालों के
खूं से पथ पर लाली होगी,
जब रक्त-बिन्दुओं से सिंचित
उपवन में हरियाली होगी,
तब समझूंगा आया वसंत!
जब सब बंधन कट जाएंगे,
परवशता की होली होगी,
अनुराग अबीर बिखेर रही
मां-बहनों की झोली होगी,
तब समझूंगा आया वसंत!