वसंत पाना हैं तो प्रकृति के निकट जाना होगा
ऋतुएं बदलती हैं तो दिनचर्या बदल जाती है। पहले ऋतु का बदलना हमारे जीवन में प्रतिबिंबित होता था। गीतों और व्यवहार में ढलता था। अब प्रकृति से यह अपनापा खो रहा है। हमारी अनुभूतियां बदल रही हैं। अब सामने होकर भी प्रकृति के हरकारे फूल, पक्षी, फसल हमें दिखलाई नहीं पड़ते हैं।
तरक्की पसंद इंसान का आसमान चहारदीवारी में कैद हुआ और घर में बौने पेड़ उग आए। प्रकृति से रिश्ता टूटते ही इंसान बोनसाई हो गया। ऐसे में कैसे मालूम हो कि वसंत आ गया है?
आइए पढ़ते हैं कुछ वासंती विचार अगले पेज पर -
हमारी सांस्कृतिक परम्परा में ऋतु परिवर्तन से मानवीय अनुभूति का संबंध है। यह संबंध तब से है, जब से मानव मित्र के रूप में प्रकृति के निकट रहा है। आज हमारे जीवन में वसंत खो रहा है। हमारे जीवन का तानाबाना प्रकृति के दोहन पर खड़ा है। नगरों में रहने वालों का हर दिन, हर सुबह एक जैसी है।