प्रेम कहानी : प्रेम भीगा गुलबंद

पीराने पीर की दरगाह पर मन्नत का धागा बांधकर मांगा था तुम्हें, कि निकाह हो तो शौहर के रूप में बस तुम्हें ही पाऊं। नीचे गुलशन अम्मी की मजार पर जाकर सजदा दिया था उसी पांच के सिक्के का, जो अब्बू ने मुझे मनचाही चीज खाने के लिए दिए थे। कित्ते से थे तब तुम! बमुश्किल आठ नौ साल के, और मैं महज सात की। सब फूफी के परिवार के साथ सनावद गए थे पीराने पीर की मजार पर मन्नत पूरी करने। गजब की भीड़ थी उस दिन मजार पर। चारों ओर लोग ही लोग नजर आ रहे थे। 

 
याद है इतनी भीड़ में तुम अकेले ही किनारे बिक रहे तले पापड़ों की टोकरी की ओर बढ़ रहे थे और तुम्हारे भाईजान ने देखते ही पीछे से कमीज खींचकर बांएं गाल पर एक तमाचा रसीद कर दिया था। तुमने बुक्का फाड़कर रोना शुरू किया और मेरी अम्मी चिल्लाई... रहने भी दो दूल्हा मियां, इस तरह तो न मारो छोटे भाई को। बच्चा है अभी। न संभले तो इसे भी मेरे हवाले कर दो। अम्मी से चिपटी मैं तुम्हें ही देखे जा रही थी। तुम दौड़कर अम्मी के दुपट्टे से सटकर चलने लगे। कैसे गले में डले कत्थई गुलबंद को मुट्ठी में लेकर आंसू पोंछे जा रहे थे और उसी से बहती नाक भी। छी! और जो आंखों का सूरमा तुम्हारे गालों पर फैला तो आगे-पीछे वाले सब हंसने लगे थे, सिवा मेरे। मैं तो उन बड़ी-बड़ी सूरमेंवाली आंखों में खो गई थी, जिन्हें देखने के बाद मुझे मजार पर सिर्फ तुम दिखाई दे रहे थे। और फिर जब सब मन्नत का धागा बांध रहे थे, तब भी मुझे तुम्हारे सिवा कुछ नजर नहीं आ रहा था। हाथ का धागा मजार पर बांधते हुए मैंने पीराने पीर से तुम्हें मांग लिया। तय भी कर लिया था, गर शौहर बने, तो मुबंई से खास बुढ़िया का सूरमा मंगाकर अपने हाथों से सजाऊंगी इन बड़ी-बड़ी आंखों में। ताकि किसी की नजर ना लगे और रोज साफ-धुला गुलबंद बांधूंगी गले में, जो कत्थई रंग का तो कतई न होगा। 
 
पूरे तेरह साल बाद पीराने पीर ने मेरी अर्जी सुनी और फूफी निकाह का पैगाम लेकर आईं। जिस दिन तुम आए थे, कितनी बेचैन थी मैं सूरमेवाली आंखों को देखने के लिए। तुम आए तो एक बार फिर निगाहें उन सूरमेवाली आंखों में अटक गई। मैंने पल भर देर किए बगैर पीर की मजार की ओर चेहरा घुमाकर शुक्रिया अदा किया। कपड़े तो बहुत फब रहे थे, पर गले में पड़ा सलेटी गुलबंद कितना गंदा हो रहा था। इतनी दूर से मुझे धूल और पसीने की गंध से सना साफ महसूस हो रहा था। गुलबंद में जंचते हो तुम, पर वो साफ और किसी उम्दा रंग का तो हो !
 
जाते समय मैं चिक की दरार बनाकर तुम्हें देख रही थी और अम्मी ने तुम्हारी जन्म तारीख पूछ ली। नए साल की अठारहवीं तारीख बताते हुए तुम्हारे गाल कैसे सुर्ख हुए जाते थे। मैंने चिक छोड़ जल्दी से अंगुलियों पर गिना। या अल्लाह ! सिर्फ चैबीस दिन बचे हैं तुम्हारी सालगिरह आने में। उस दिन मैं तुम्हें मुबारकबाद के साथ एक खास तोहफा दूंगी। अपने हाथों से बुना संदर-सा गुलबंद। जो रेशम की तरह नर्म होगा और सांसों की तरह गर्म। उसे तुम सदा अपने गले से लगाकर रखना, ज्यों मैं साथ हूं। 
 
कैसे बुनूंगी गुलबंद? घर में ऊन सलाई दिखी, तो अम्मी पूछताछ करेंगी। बनेगा तो सब जान जाएंगे। शन्नो का घर ठीक रहेगा। रोज तो आना-जाना करती हूं उसके घर। बस, घंटे दो घंटे भी बुना, तो सालगिरह तक तो बनकर तैयार हो ही जाएगा। कौन सा रंग लूं ? फिरोजी भाता है मुझे, पर हर कपड़े के साथ नहीं जंचेगा। गुलाबी तो जल्द गंदा हो जाएगा। गहरा रंग तो भूलकर भी ना लूंगी। हां, गुलबासी बढ़िया रहेगा। वाह, खूब जंचेगा सूरमेदार आखों वाले के गले में गुलबासी रंग का गुलबंद। कल ही ले आऊंगी ऊन। 
 
दस दिन बीत गए और अभी बित्ता भर ही बुन पाई हूं। आजकल अम्मी भी न, शन्नो के घर जाने पर पूछताछ करने लगी हैं। निकाह तय हो गया है तेरा, बिना कारण इधर-उधर न जाया कर। अम्मी तो नाहक ही चिंता किए जाती हैं। शन्नो कह रही थी, थोड़ा मैं बुन दूं रात में? जल्दी बन जाएगा। मैंने कह दिया, खबरदार जो एक सलाई भी बुनी तो! गुलबंद का तो एक-एक फंदा मेरी अंगुलियों की गर्माहट से गुजरेगा, मेरी सांसों के सपनों से सलाई दर सलाई आगे बढ़ेगा तब ही तो उनके गले में सजने लायक बनेगा।
 
समझ नहीं आ रहा कितना और बनाना है ? किससे नापूं ? उनका कद मुझसे तो लंबा है, फिर गुलबंद सही नाप का कैसे बनेगा ? हां, शन्नो का भाई लगभग उसी कद का है। कल जाकर सबसे पहले नाप लूंगी। तब तय हो जाएगा कितने दिनों का काम बाकी है। पर अब हाथ जरा जल्दी चलाना होंगे। नया साल लगे भी दस-बारह दिन तो गुजर ही गए, समय बचा ही कितना है ? 
 
सच्ची, कितनी मतलबी होती हैं न सहेलियां भी। वो संगीता यूं तो जीजी की शादी में बुला भी नहीं रही थी, पर कल जब उनकी मेंहदीवाली नहीं आई तो मौसी के साथ शादी की पत्रिका देने आ गई। और अम्मी से मिन्नतें कर करके मुझे हाथ मंडवाने के लिए राजी कर लिया। अम्मी ने भी कहा कि, जा बेटी, शगुन का काम है। अल्लाह अच्छा सिला देता है नेकी करनेवालों को। बस, ताई, मौसी, बुआ, बहन सबके हाथों में मेहंदी लगाती रही। गर्दन, पीठ सब दर्द करने लगे। सबकी तारीफ तो खूब मिली। पूरे दो दिन हो गए। एक फंदा नहीं बुन पाई। कुछ हरारत-सी भी लग रही है, लगता है शन्नो के घर नहीं जा पाऊंगी। 
 
हाय, कितना खूबसूरत लग रहा है गुलबंद। बस, थोड़ा और बन जाए कि हो गया मेरा तोहफा तैयार। दिन भी दो ही बचे हैं तुम्हारी सालगिरह में। अरे कहां, कल ही तो बचा है, परसों तो है ही सालगिरह। कल तक बना लूंगी पूरा, फिर सुबह-सुबह खुद ही जाकर डाल दूंगी तुम्हारे गले में, जैसे संगीता की जीजी ने वरमाला डाली थी उनके दूल्हे के गले में। मैंने तो कितनी ही बार सपने में तुम्हें यह गुलबंद गले में डाले हुए देखा है। देखना जरा भी सर्दी नहीं लगेगी तुम्हें। इतना गर्म है यह गुलबंद। 
 
अम्मी के पैर में भी अभी ही चोट लगना थी। काम तो सारा मेरे सिर आ गया। क्या होगा गुलबंद का ? सुबह जल्दी उठकर काम कर लूंगी। फिर फटाफट गुलबंद पूरा कर दूंगी। ओह ! शाम हो गई और मैं तो शन्नो के घर जा ही नहीं पाई ! कोई बात नहीं, अभी देर है। कल तो सारे काम छोड़कर गुलबंद ही पूरा करूंगी। अम्मी को दवा लगाकर सीधे शन्नो के घर। 
 
आज भी शाम होने आई। पूरा होने में थोड़ा बाकी है। आज इसे घर ले चलती हूं। रात में सबके सोने पर पूरा कर लूंगी और सुबह नमाज के बाद सीधे फूफी के घर। बस, कल तो बता ही दूंगी कितने जतन से बनाया है यह तोहफा। कभी वो पूछेंगे कि इस हसीन तोहफे के बदले मैं क्या दूं तो झट से कहूंगी, यह सूरमेवाली आंखें सदा के लिए मेरे नाम कर दो।
 
अरे, मैं गुसलखाने से बाहर आई और बैठक से तो उनकी आवाज आ रही है? वो ही हैं या गुलबंद पूरा होने की खुशी में मेरे कान बज रहे हैं? ओह ! अम्मी से दुआ सलाम कर वे मेरे कमरे की ओर आ रहे हैं...इतनी भी क्या बेताबी...सालगिरह तुम्हारी है... मैं आ ही तो रही थी मुबारकबाद देने। या अल्लाह ! कितने खूबसूरत लग रहे हैं। खुदा का शुक्र है, आज गुलबंद नहीं डाला।
 
अब तो मेरे हाथों ही सजेगा गुलबंद। सलामवालेकुम जनाब... आज इतनी सुबह तशरीफ ले आए ? मुझे आने का मौका ही नहीं दिया। मैं तो बस आ ही....
वालेकु.....कल कहां थीं तुम ? सारा दिन तुम्हारा इंतजार करता रहा... अब आओगी... अब आओगी...रात तक बेसबर ही रहा...सबके साथ होकर भी साथ नहीं था मैं। पूरी रात करवटें बदलते बीती और आज तो...  
ओह, कल....तो आज क्या तारीख है ?  
नए साल की उन्नीस तारीख।  


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