मुलायम के गढ़ में कल्याण सिंह के बगैर पूरा नहीं होता था भाजपा का चुनावी शंखनाद, जानिए वजह...

पुनः संशोधित रविवार, 22 अगस्त 2021 (16:47 IST)
इटावा। हिंदुत्व के सबसे बड़े चेहरे कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अब इस हमारे बीच नहीं है, लेकिन समाजवादी गढ़ इटावा में उनके चाहने वालो की कोई कमी नहीं है। लोधी बाहुल्य में उनकी सभा के बगैर भाजपा का कोई भी चुनावी शंखनाद कभी भी पूरा नहीं हुआ।
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भाजपा के आधार स्तंभ कहे जाने वाले राम जन्मभूमि आंदोलन के मुख्य अगुवाकार कल्याण सिंह के निधन के बाद उनके चाहने वालो पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। वैसे तो इटावा समाजवादी गढ़ के रुप में जाना जाता है, लेकिन इसके बावजूद भी इलाके में कल्याण सिंह की जड़ें बेहद मजबूत रही है।
कल्याण सिंह सत्ता में रहे हो या न रहे हो लेकिन उनका इटावा जिले के इकदिल इलाके के सूखाताल गांव से बेहद लगाव रहा है। उनका चुनावी प्रचार तब तक पूरा नही माना जाता था जब तक सूखाताल गांव में कल्याण सिंह की सभा न हो जाए।

इकदिल इलाके के सूखाताल गांव व आसपास के इलाके में बड़ी तादात में लोधी बिरादरी के लोगो रहते है, जो कल्याण सिंह और भाजपा की समर्थक और प्रशंसक मानी जाती है। इसी लिहाज से पार्टी लोधी बिरादरी का वोट हासिल करने के लिए सिंह की सभा को सूखाताल में हर हाल में आयोजित करवाता रहा है।
चाहे विधानसभा या लोकसभा का चुनाव हो हाईकमान सूखाताल में उनकी सभा का होना बेहद जरुरी मानता था। भाजपा को इसका खासा फायदा भी मिला था, इसमें कोई दो राय नहीं कि मुलायम सिंह यादव का प्रभावी इलाका होने के बावजूद लोधी बिरादरी के लोगों का झुकाव व लगाओ हमेशा कल्याण सिंह की बदौलत भाजपा से बना रहा है।

यह बात सही है जब कल्याण सिंह वर्ष 1999 में भाजपा से इस्तीफा देकर अपनी राष्ट्रीय जनक्रांति पार्टी का गठन किया था, तो उसके बाद इस इलाके के अधिकांश लोधी मतदाताओं ने भाजपा छोड़ कर समाजवादी पार्टी का रुख कर लिया था।
कल्याण सिंह की वजह से उस समय साक्षी महाराज भी लोधी बाहुल्य इलाके में कल्याण सिंह के समर्थन में लोगो को मनाने के लिए सभाओं का आयोजन कराने के लिए जी जान से जुट गए थे।
भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष शिव प्रताप राजपूत जो अब समाजवादी पार्टी में है, ने कल्याण सिंह से अपनी नजदीकियों को साझा करते कहा कि सूखाताल के जिस खेत में बाबू जी (कल्याण सिंह) की सभा आयोजित हुआ करती रही है वो 15 बीधा का खेत भी उनका ही है।
हजारों की भीड़ की क्षमता वाले इस मैदान में लोधियो के 84 गांवो के लिए लोग कल्याण सिंह को सुनने के लिए दौडे चले आते थे। चुनाव के बाद जब नतीजा सामने आता है तो फिर भाजपा को इस फायदा जीत के तौर पर मिलता रहा है।

राजपूत बताते है कि कल्याण सिंह भाजपा से अलग हो गए। जिस कारण वह सूखाताल में भाजपा के पक्ष में प्रचार करने नहीं आए, नतीजे के तौर पर समाजवादी पार्टी के महेंद्र सिंह राजपूत के पक्ष में हवा का रूख बन गया। साल 2002 मे पहली दफा इटावा सदर सीट से ओबीसी वर्ग से जुड़ा हुआ कोई भी उम्मीदवार जीत हासिल करने की स्थिति में आ गया था।
उन्होंने कहा कि बाबू जी की ऐसी शख्सियत रही है कि वह इटावा के लोधी बाहुल्य इलाकों के एक एक शख्स को नाम के साथ पुकारने की काबिलियत रखते थे और उनकी इसी शख्सियत का नतीजा यह था कि जब भी उनकी सभा सूखाताल गांव में हुआ करती थी तो वह मंच से नाम ले लेकर के लोगों को संबोधन किया करते थे। भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में वोट देने की न केवल अपील करते थे बल्कि अधिकार के साथ में भी वोट मांगा करते थे।
भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष जसवंत सिंह वर्मा अपने साथ कल्याण सिंह की यादों को ताज़ा करते हुए कहा कि सिंह उनके राजनीतिक गुरू रहे है। कल्याण सिंह की बदौलत वो राजनीति के इस पायदान तक पहुंचने मे कामयाब हुए।

कल्याण सिंह की कई सभाओं को कवर कर चुके इटावा के वरिष्ठ पत्रकार सुभाष त्रिपाठी बताते हैं कि जब भी सिंह इटावा और आसपास के दौरे पर आते थे तो पत्रकारों से बड़ी ही साफगोई से बात करने में कोई हिचक नहीं खाते थे। उनका यही अंदाज़ हर किसी को इतना भाता था कि वो हमेशा हमेशा के लिए उनका मुरीद बन जाता था।

वर्ष 1999 में जब कल्याण सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो इटावा में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश कार्यसमिति का
आयोजन किया गया। त्रिपाठी बताते हैं कि कल्याण सिंह का ऐसा प्रभाव था कि अलीगढ़ से लेकर हमीरपुर तक उनके समर्थक थे,जो एक आवाज़ पर उनके साथ आ खड़े होते थे। एक वक्त तो ऐसा था कि अटल,आडवाणी,जोशी और कल्याण सिंह के बिना भारतीय जनता पार्टी अधूरी मानी जाती थी।
वर्ष 1997 मे इटावा मे समाजवादी पार्टी से जुड़ा लोहिया वाहिनी संगठन अपनी खासी पहचान बनाता हुआ दिख रहा था।

इसी बीच मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की इटावा के पुरबिया टोला स्थित तलैया मैदान में भाजपा की एक सभा का आयोजन किया गया जिसमे मुख्यमंत्री को कालेझंडे दिखाने की खुफिया रिर्पोट प्रशासन स्तर पर मिली।
सिंह ने वहां सभा में अपना भाषण शुरू करते ही कहना शुरू कर दिया कि आज लोहिया वाहिनी के लोग काला झंडे दिखाने वाले थे लेकिन वो अब दिखाई भी नहीं पड़ रहे हैं। कल्याण सिंह लोहिया वाहनी की बढते प्रभाव को लेकर सहज नहीं थे उन्होंने साफ-साफ खूल कर कहा कि मेरे यहां से जाने के बाद ये लाल टोपी धारी दबंग सड़को पर नहीं दिखने चाहिए। (वार्ता)



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