मीना कुमारी ने लिखी थी यह 5 गजलें ...

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शीशे का बदन..

कितना हल्का-सा, हल्का-सा तन हो गया
जैसे शीशे का सारा बदन हो गया
गुलमोहर के-से फूलों में बिखरी हुई
कहकशां के-से रस्ते पे निखरी हुई
मेरी पलकों पे मोती झालर सजी
मेरे बालों ने अफशां की चादर बुनी

मेरे आंचल ने आंखों पे घूंघट किया
मेरी पायल ने सबसे पलट कर कहा
अब कोई भी न कांटा चुभेगा मुझे
जिंदगानी भी देगी न ताना मुझे

शाम समझाए भी तो न समझूंगी मैं
रात बहलाए भी तो न बहलूंगी मैं

सांस उलझाए भी तो न उलझूंगी मैं
मौत बहकाए भी तो न बहकूंगी मैं
मेरी रूह भी जला-ए-वतन हो गई
जिस्म सारा मेरा इक सेहन हो गया

कितना हल्का-सा, हल्का-सा तन हो गया
जैसे शीशे का सारा बदन हो गया।



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