क्या यही ‘रियलिटी’ है?
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दरअसल रियलिटी शो सफल और लोकप्रिय होने का शॉर्टकट है, इस वजह से ये दिन-प्रतिदिन लोकप्रिय होते जा रहे हैं। टीवी पर आकर प्रस्तुति देने की वजह से आपके बारे में लोग जानने लगते हैं।
यह एक ऐसा मंच है जो उन लोगों को अवसर देता है, जो प्रतिभाशाली होने के बावजूद सही लोगों तक नहीं पहुँच पाते, लेकिन विजेता को चुनने की प्रणाली सही नहीं होने की वजह से मामला गड़बड़ हो जाता है। एसएमएस के जरिए चुनाव होता है और कई बार कम प्रतिभाशाली प्रतियोगी भी विजेता बन जाता है। प्रस्तुति देने के बाद एक सप्ताह तक परिणाम का इंतजार करना प्रतियोगी के मन में खौफ पैदा करता है।
बात की जाए जजों की। इन शो में जब जज को परिणाम देना ही नहीं पड़ता तो फिर इन्हें बैठाया क्यों जाता है, यह समझ के परे हैं। शायद जज उन लोगों को राह दिखाते हैं जो संगीत या अभिनय की बारिकियाँ ठीक से समझ नहीं पाते, साथ ही वे प्रतियोगी की त्रुटियों की ओर उनका ध्यान आकर्षित करते हैं ताकि उनके परफॉर्मेंस में सुधार आए। यदि ऐसा है तो इन्हें जज के बजाय कोई और नाम देना चाहिए।
शिंजिनी की हालत बताती है कि प्रतियोगी कितने घबराए या डरे हुए हैं। कमजोर दिल वालों का हाल शिंजिनी जैसा हो जाता है। जज के चेहरों से उन्हें डर लगता है क्योंकि वे सरेआम डाँटते हैं। टीवी के जरिए पूरी दुनिया उन्हें देखती है। जजों को अपनी बात प्यार से रखना और समझाना चाहिए।
माता-पिता की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जीतने का दबाव वे अपने बच्चों पर इतना डालते हैं, मानो यह जीवन-मरण का प्रश्न है। सभी को पहला नंबर के सिवाय कुछ नहीं चाहिए। पहले नंबर की आड़ में उन्हें पैसा और ग्लैमर भी दिखाई देता है।
प्रतियोगिता दबाव मुक्त और खुशहाल वातावरण में हो तो प्रतियोगी ज्यादा बेहतर प्रदर्शन कर पाएँगे। उम्मीद है कि अन्य चल रहे कार्यक्रम के जज और प्रतियोगियों के माता-पिता इससे कुछ सबक सीखेंगे।
