सावन के शिव
- पंडित आर.के. राय
रौद्रावतार भगवान शिव की सौम्य मूर्ति एवं रूप का दर्शन मात्र श्रावण मास में ही संभव है। जैसा कि पुराणों में या विविध ग्रन्थों में या लोकमत के रूप में यह प्रसिद्ध है कि भगवान रुद्र के 11 ही अवतार है। जो भाद्रपद से लेकर आषाढ़ माह तक 11 महीनों में नाम के अनुरूप मासों में पूजित एवं सिद्ध किए जाते हैं। किन्तु श्रावण माह में शान्त, सौम्य, सुन्दर, प्रफुल्लित एवं सन्तुष्ट भगवान शिव की अनुपम एवं मनमोहक मूर्ति सद्यः प्रसन्न एवं वरदायिनी होती है। इस महीने में भगवान शिव मुँह माँगा वरदान देने के लिए तत्पर रहते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस श्रावण माह में सीधे-सादे भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करके जो वरदान चाहें वह माँग लें। जगत मोहिनी माता पार्वती के साथ भूतभावन भगवान भोलेनाथ निर्विकार अपने हर्ष से भरे हृदय के साथ उन्मुक्त मन से अपने भक्तों को इस महीने सब कुछ दे देने के लिए सदा तत्पर रहते हैं। और निश्चित ही भक्त भगवान शिव के इस रूप की पूजा का खूब लाभ उठाते हैं। भगवान शिव ही ऐसे देव हैं जो स्वयं तो वस्त्र हीन हैं। किन्तु सम्पूर्ण विश्व को अपनी भक्ति का आवरण प्रदान कर सारे दैहिक, दैविक एवं भौतिक तापों से मुक्त कर देते हैं। स्वयं तो स्थायी निवास के अभाव में दर-दर भटकते रहते हैं। किन्तु अपने भक्तों को मुक्ति का वरदान प्रदान कर सदा के लिए भ्रम एवं माया से परिपूर्ण सदा कष्टकारी जगत प्रपंच से छुटकारा प्रदान करते हैं एवं पारब्रह्म परमेश्वर अपने रूप में विलीन एवं स्थिर कर देते हैं।
स्वयं सागपात, भाँग-धतूरा एवं स्वादहीन खाद्य पदार्थ खाने वाले भगवान शिव अपने भक्तों को ज्ञान, वैराग्य, आत्मोन्नति, सत्यविवेक, श्रद्धा, विश्वास एवं प्रेम का विविध छप्पन भोगयुक्त विविध व्यंजन प्रदान करते हैं। स्वयं राख, भस्म एवं धूलधूसरित शरीर वाले भगवान शिव अपने प्यारे भक्तों को यश, कीर्ति, प्रतिष्ठा, सम्मान आदि का विविध लेप प्रदान कर उन्हें दिव्य सुगन्ध फैलाने वाले बना देते हैं। भयंकर जहर की उग्र ज्वाला से संसार एवं जीव की रक्षा हेतु शंख में उस विष को रखकर पी जाने वाले भगवान साम्बसदाशिव नीलकण्ठ अपने भक्तों को भक्ति, संतोष, न्याय एवं सदाचार के निर्मल अमर पेय पीने के लिए प्रदान करते हैं। तथा सदा भयंकर जीवों से घिरे रहने वाले त्रिपुरान्तकारी भगवान शिवशंकर अपने भक्तों को निर्मल गुण, आध्यात्मिक चिन्तन, कलुषतारहित विचार, दूरदृष्टि, पूर्ण, अन्तिम एवं उचित निर्णय के रूप में सदा साथ रहने वाले परिजन प्रदान करते हैं। निःसंदेह भगवान भोलेनाथ अपने भक्तों को वह सब कुछ प्रदान करते हैं। जो अन्य किसी भी देवी-देवता की पूजा से सम्भव नहीं हैं। और तो और जो बिना अपने जीवन या मृत्यु का विचार किए तपस्या से प्रसन्न होकर भस्मासुर को वरदान दे सकते हैं। प्रसन्न होने के बाद वह औघड़ दानी भगवान शिव क्या नहीं दे सकते हैं? नीलक नामक निषाद ने कौवे का जूठा कन्द शिवलिंग पर चढ़ाया। तो वह मैत्रेय (वर्तमान में मिश्र) नामक देष का राजा बन गया। विभ्राष नामक राक्षस तंत्र सिद्धि के लिए नीलकण्ठ नामक पक्षी का सिर काट कर ला रहा था। रास्ते में दूसरा राक्षस उस की और दौड़ा। विभ्राष ने उस पक्षी का सिर एक शिवलिंग की आड़ में इस विश्वास के साथ छिपा दिया कि शिवजी उस सिर को बचा कर रखेंगे। एवं उस सिर की रक्षा करेंगे। अपने इस विश्वास के कारण वह राक्षस विभूति नामक महान सिद्ध तपस्वी बन गया। पाँचों भाई पांडव भगवान शिव को नियमित रूप से मात्र त्रिदलात्मक बिल्वपत्र एवं जल चढ़ाकर सदा के लिए अमर बन गए।