Shri Krishna 21 May Episode 19 : जब लल्ला ने खाई मिट्टी और खुद को बांध लिया ओखल से

अनिरुद्ध जोशी|
निर्माता और निर्देशक के श्रीकृष्णा धारावाहिक के 21 मई के 19वें एपिसोड ( Shree Krishna Episode 19 ) में माता यशोदा बालकृष्ण को पहली बार नदी के घाट पर ले जाती हैं जहां लल्ला को वह एक जगह बिठाकर खुद नदी में स्नान करने चली जाती हैं। इस दौरान माता धरती आकर बालकृष्ण को प्रणाम करके खुद को कृतघ्न मानती हैं। फिर लल्ला माता धरती का सम्मान रखने के लिए नैवेद्य के रूप में मिट्टी का सेवन करने लग जाते हैं। गोपियां ये देखकर माता यशोदा मैया से कहती हैं कि यशोदा तेरा लल्ला मिट्टी खा रहा है देख।
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यशोदा मैया यह सुनकर दौड़कर लल्ला के पास आती है और उसका मुंह पकड़कर कहती है छी-छी। फिर अपने पल्लू से मुंह की मिट्टी साफ करती है। तब एक महिला कहती है कि अरे बाहर क्या साफ कर रही है, मुंह के अंदर देख कितनी मिट्टी खा रखी है। मिट्टी का पूरा गोला खाया है। तू माखन खाने नहीं देगी तो क्या करेगा बेचारा? मिट्टी को ही माखन समझकर खा गया होगा। यह कहकर महिलाएं वहां से चली जाती हैं।
तब यशोदा मैया कहती है अच्छा मिट्टी को माखन समझकर खा गया। बालकृष्ण मुस्कुराते रहते हैं। तुझे मिट्टी और माखन की पहचान नहीं? दिखा मुंह में कितनी मिट्टी है, मुंह खोल। खोल मुंह। तब बालकृष्ण बोलते हैं मैंने मिट्टी नहीं खाई। यह सुनकर यशोदा मैया कहती है, झूठे। खोल मुंह। दिखा मुझे, खोल मुंह।

तब बालकृष्ण मुंह खोल देते हैं। यशोदा मैया मुंह के अंदर देखती है तो उन्हें ब्रह्मांड नजर आता है। यह देखकर वह विस्मित हो जाती है। उनकी आंखें फटी की फटी रह जाती है। फिर उन्हें अपना और लल्ला का रूप नजर आता है। यह देखकर तो वह और भी आश्चर्य करने लगती है।
तभी वहां भगवान विष्णु प्रकट होकर कहते हैं, यशोदा।...माता यशोदा ऊपर देखती हैं। भगवान विष्णु कहते हैं यशोदा। माया के आवरण से बाहर निकलो और हमारी ये चमत्कारिक अद्भुत लीला देखो। तब यशोदा मैया अपने शरीर से निकलकर आकाश में स्थित प्रभु के समक्ष खड़ी होकर उन्हें नमस्कार करती हैं। फिर विष्णु कहते हैं कि तुम्हारे पूर्व जन्म की घोर तपस्या के फलस्वरूप इस समय तुम्हें हमारे और हमारी सृष्टि के विराट स्वरूप का दर्शन हुए हैं। हे देवी तुम अपनी मातृभक्ति से ही हमें प्राप्त कर लोगी। यह कहकर विष्णुजी चले जाते हैं।
तब माता योगमाया प्रकट होती है और कहती हैं कि देवी यशोदा प्रभु की कृपा के कारण तुम्हें जो दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ है उस पर अब मैं माया का परदा डालने जा रही हूं। वह परमज्ञान अब तुम्हारी आत्मा की गहराई में सुषुप्त अवस्था में स्थिर रहेगा। जिससे तुम्हें उसकी प्रकट स्मृति नहीं रहेगी। यशोदा मैया को यह कहकर वह चली जाती हैं।

यशोदा मैया पुन: अपने शरीर में जाकर लल्ला के मुंह में देखती है और वह घबरा जाती है और वह रोते हुए कहती है, हे अंतरयामी मेरे लाल कि रक्षा कर। मेरे लाल के मुख में कोई भूत-प्रेत घुस गया है। हे दुखभंजन मेरी पुकार सुनो। मेरा एक ही पुत्र है उसकी रक्षा करो। फिर वह लल्ला से कहती है लल्ला देवी को प्राणाम कर और पीपल देवता को भी प्रणाम कर। लल्ला दोनों को प्रणाम करता है।

उधर, कारावास में देवकी और वसुदेवजी को बताया जाता है फिर गोकुल में थोड़े बड़े हुए और श्रीदोनों साथ साथ घुम रहे होते हैं तो नगर की महिलाएं उन्हें देखकर कहती हैं, दोनों भैया कितने सुंदर लग रहे हैं। फिर दोनों भाइयों को दूसरे के घरों में से माखन चुराते हुए गोपिकाएं देखकर हंसती हैं। तब एक युवती कहती है कि कितने भोले हैं जैसे उन्हें किसी ने देखा ही नहीं। तब दूसरी युवती कहती है, भोले नहीं चोर हैं चोर...माखन चोर।
फिर काकी जाकर यशोदा मैया को बताती है कि कैसे तेरा लल्ला बाहर माखन चोरी कर खा रहा है, लेकिन कोई बुरा नहीं मान रहा है। तब यशोदा मैया कहती है लेकिन कब तक कोई बुरा नहीं मानेगी। एक दिन सब उसे चोर कहेंगी। आज उसे घर आने दो डाटूंगी उसे।

फिर दोनों घर आते हैं तो श्रीकृष्ण कहते हैं मां मुझे भूख लगी है मुझे माखन दो। तब मां कहती है जाओ किसी के घर जाकर माखन चुराओ और खा लो। तब श्रीकृष्ण कहते हैं मैं किसी का माखन क्यों चुराऊं? मेरे घर में ही माखन है। यह कहकर वे ऊपर लटकी मटकी को दिखाते हैं। तब यशोदा मैया कहती है कि पर तुम्हें यह माखन नहीं मिलेगा। तब बालकृष्ण पूछते हैं, क्यों? माता कहती है क्योंकि तुमने बसंती के घर चोरी की है। पहले कान पकड़कर क्षमा मांगों और वचन दो की कभी चोरी नहीं करोगे, तभी माखन मिलेगा हां। श्रीकृष्ण कहते हैं नहीं मुझे पहले माखन चाहिए। तब माता कहती है नहीं पहले क्षमा मांगों। तब श्रीकृष्ण कहते हैं मटकी फोड़ दूं? माता कहती है, अरे! क्या कहा मटकी फोड़ दूं? जाओ तोड़कर दिखाओ। तब श्रीकृष्ण कहते हैं फोड़ दूं? माता कहती है हां जा तोड़ के दिखा, मैं भी देखूं कैसे तोड़ता है।
तब श्रीकृष्ण एक जगह चढ़कर डंडे से मटकी फोड़ देते हैं और उछल कर खुश होकर कहते हैं मैया मैंने मटकी तोड़ दी। यह देखकर माता यशोदा डंडा उठाकर लल्ला को मारने दौड़ती है तो लल्ला वहां से भाग जाता है। आगे लल्ला और पीछे मैया। फिर लल्ला एक पलंग पर चढ़कर नाचते हुए कहते हैं मैया मैंने मटकी तोड़ दी, मैया मैंने मटकी तोड़ दी। तब लल्ला पलंग से नीचे उतरकर फिर भागते हुए आंगन में चला जाता है। मैया भी उसके पीछे डंडा लेकर दौड़ती हैं। लेकिन लल्ला भी मैया को छका देता है तब जाकर कहीं पकड़ में आता है।
खीझकर माता यशोदा कहती है कि अभी तुझे मजा चखाती हूं। इस ओखली से बांधती हूं। सारा दिन धूप में सड़ता रहेगा तब समझ में आएगा। तब माता यशोदा बालकृष्ण को ओखली से बांधने जाती है तो प्रभु की माया से रस्सी छोटी पड़ जाती है। तब वह कहती है ठहर मैं तुझे इससे लंबी रस्सी से बांधती हूं। तब वह लंबी रस्सी लेती है लेकिन वह भी पहले वाली रस्सी के बराबर निकलती है और छोटी पड़ जाती है। तब माता कहती है अरे ये क्या कर रहा है रे तू? पेट फूला रहा है? तब वह उन दोनों रस्सियों को जोड़कर कहती हैं अब देखूं कैसे पूरी नी आती। लेकिन वह रस्सी की उतनी ही छोटी पड़ जाती है तब वह खीझकर कहती है अरे ये क्या चमत्कार है रे।
तभी वहां कुछ महिलाएं आकर कहती हैं अरे यशोदा आज यमुना घाट नहीं चलना है क्या? यशोदा मैया कहती है चलना है लेकिन जरा इस लल्ला को तो ठीक कर दूं। तब वे महिलाएं पूछती हैं कि क्या किया लल्ला ने? तब यशोदा मैया बताती है कि किस तरह इसने मटकी तोड़ दी। यह कहकर वह फिर उस रस्सी में एक और रस्सी जोड़कर लल्ला को बांधने का प्रयास करती है, लेकिन वह रस्सी फिर छोटी पड़ जाती है तो मैया कहती है ये क्या चमत्कार है कितनी ही लंबी रस्सी बांधती हूं लेकिन हर पार वह दो अंगुल छोटी ही रह जाती है।
तब मैया कहती है अरे! मैं तो हार गई रे लल्ला अब तू ही कोई रास्ता बता। तब बालकृष्ण कहते हैं मैया मैं खुद बांध दूं? मैया कहती है ले बांध। तब बालकृष्ण खुद को जब बांध लेते हैं तो मैया आश्चर्य से देखने लगी है। फिर मैया कहती है, अरे कैसा छलिया है रे तू, अब तक तो पेट फूला रहा था अब कैसे आराम से बंध गया। फिर मैया कहती है, बस अब इस ओखल से बांधकर पूरा दिन धूप में पड़ा रहना। तब तक मैं स्नान करके आऊं तू यहीं बंधा रहना। यही दंड है तेरा। यह सुनकर महिलाएं दंग रहा जाती है। फिर मैया और रस्सियां बाधकर चली जाती हैं।

ओखली से बंधे श्रीकृष्ण अपने सामने स्थित दो वृक्षों को देखते हैं तो उनमें उन्हें दो देवता नजर आते हैं। फिर वह अपनी कमर से बंधी डमरूनुमा ओखली को घसीटकर ले जाते हैं और उन दोनों वृक्षों के बीच ओखली को अड़ाकर दूसरी ओर कमर से बंधी रस्सी खींचते हैं तो दोनों वृक्ष उखड़कर नीचे गिर पड़ते हैं। उनमें से दो देवता निकलकर बालकृष्ण को प्रणाम करते हैं।
प्रणाम करके वे कहते हैं कि हम दोनों यक्ष कुबेर के पुत्र नंद कुबेर और मणि ग्रीव हैं। एक बार हम जलक्रीड़ा कर रहे थे तभी वहां से नारद मुनि गुजरे। हमारे साथ क्रीड़ा कर रही युवतियों ने उन्हें देखकर लज्जावश अपने वस्त्र पहन लिए लेकिन हमने उनका सम्मान नहीं किया और उनकी हंसी उड़ाने लगे तो उन्होंने हमें जड़ हो जाने का श्राप दे दिया जिसके चलते हम वृक्ष बन गए। उन्होंने ही कहा था कि द्वापर में प्रभु श्रीकृष्ण ही अब तुम्हारा उद्धार करेंगे। जय श्रीकृष्ण।

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