Pitru Paksha 2020 : यदि नहीं किया श्राद्ध कर्म तो क्या होगा, पितृदोष लगेगा या नहीं?

अनिरुद्ध जोशी|
बहुत से वैदिक मतावलंबी इस कर्म को ढकोसला मानते हैं। वे इसका विरोध करते हैं। यही कारण है कि उनके प्रभाव में आकर बहुत से लोग श्राद्ध कर्म नहीं करते हैं। आधुनिक विज्ञान युग के चलते भी अब लोग धर्म की कई बातों में विश्वास नहीं रखते हैं और उनमें से बहुत तो नास्तिक हो चले हैं। आओ जानते हैं कि यदि नहीं किया श्राद्ध कर्म तो क्या होगा, पितृदोष लगेगा या नहीं?
भाद्रपद की पूर्णिमा एवं आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक का समय पितृ पक्ष कहलाता है। इस पक्ष में मृत पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है। पितृ पक्ष में पितरों की मरण-तिथि को ही उनका श्राद्ध किया जाता है। सर्वपितृ अमावस्या को कुल के उन लोगों का श्राद्ध किया जाता हैं जिन्हें हम नहीं जानते हैं।
वेदानुसार यज्ञ 5 प्रकार के होते हैं- 1. ब्रह्म यज्ञ, 2. देवयज्ञ, 3. पितृयज्ञ, 4. वैश्वदेव यज्ञ, 5. अतिथि यज्ञ। उक्त 5 यज्ञों में से ही एक यज्ञ है पितृयज्ञ। इसे पुराण में श्राद्ध कर्म की संज्ञा दी गई है। वैदिक और पौराणिक दोनों ही मतों में इस कर्म को करने के अलग अलग तरीके हैं।

वेदों में पितरों की स्तुति मिलती हैं:-
।।ॐ अर्यमा न त्रिप्य्ताम इदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नमः।...ॐ मृत्योर्मा अमृतं गमय।।
भावार्थ : पितरों में अर्यमा श्रेष्ठ है। अर्यमा पितरों के देव हैं। अर्यमा को प्रणाम। हे! पिता, पितामह, और प्रपितामह। हे! माता, मातामह और प्रमातामह आपको भी बारम्बार प्रणाम। आप हमें मृत्यु से अमृत की ओर ले चलें।

वेद कहता है: -ये न: पितु: पितरो ये पितामहा... तेभ्य: पितृभ्यो नमसा विधेम।। -अथर्व 18/2/49
अर्थात पितृ, पितामह और प्रपितामहों को हम श्राद्ध से तृप्त करते हैं और नमन करते हुए उनकी पूजा-अर्चना करते हैं।
इस प्रकार वेदों में पितृयज्ञ के संपूर्ण विधान की महत्ता और दिव्यता का वर्णन मिलता है। आगे चलकर पुराण और संस्मृतियों में वेद आधारित श्राद्धकर्म की विधि को 4 तरह से संपन्न करना बताया गया। ये कर्म हैं- हवन, पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोजन।

मुक्ति और मोक्ष में फर्क है। मुक्ति से बढ़कर है मोक्ष। मोक्ष को प्राप्त करना आसान नहीं है। जब कोई व्यक्ति अपने मृतकों का श्राद्ध करता है तो वह उसकी मुक्ति की कामना करता है। मुक्ति एक साधारण शब्द है। श्राद्ध कर्म मुक्ति कर्म है। यह क्यों किया जाता है और क्या इससे मुक्ति मिलती है?

क्या करना चाहिए श्राद्ध?
1.अतृप्तता क्या होती है : जिसने अपना संपूर्ण जीवन जिया है और संसार के सभी कार्यों के करने के बाद भक्ति, ध्यान और पुण्य भी किया है वह देह छोड़ने के बाद संभवत: अतृप्त नहीं रहता है। पुराणों के अनुसार अतृप्त आत्माएं मुक्त नहीं हो पाती है। उदाहरणार्थ यह कि जब आप बगैर पानी पीए सो जाते हैं और यदि नींद में आपको प्यास लगती है तो आप सपने में कहीं जाकर पानी पी रहे होते हैं लेकिन कितना ही आप पानी पीएं आपकी उससे प्यास नहीं बुझती है। आप तृप्त नहीं होते हैं क्योंकि यह प्यास आपके भौतिक शरीर को लगी है सूक्ष्म शरीर को नहीं। मरने के बाद व्यक्ति की हालत ऐसी ही हो जाती है। वह अपनी आदतवश कार्य करता है, क्योंकि उसने खुद को कभी शरीर से भिन्न नहीं समझा है। ऐसे में देह छोड़ने के बाद आत्मा की उसके कर्मों के अनुसार उसे गति मिलती है।
2. उत्तरदायित्व : ऐसे में प्रत्येक पुत्र या पौत्र या उसके सगे संबंधियों का उत्तरदायित्व होता है कि वह उक्त आत्मा की तृप्ति और सद्गति के उपाय करें ताकि वह पुन: जन्म ले सके।

श्राद्धकर्ता चाहता है कि हमारे पूर्वजों को किसी भी प्रकार का कष्ट न हो। अर्थात या तो वे देवलोक या पितृलोक में स्थित हो या पुनर्जन्न ले लें। वेद और पुराणों में श्राद्ध कर्म की मंत्र सहित कुछ ऐसी विधियां है जिससे कि मृतकों का आत्मबल विकसित होता है और उनका संताप मिट जाता है। संताप मिटने से ही उन्हें प्रेत यानि से मुक्ति मिलती है और वे सद्गति को प्राप्त करके या तो पितृलोक में स्थित हो जाते हैं या नया जन्म ले लेते हैं। श्राद्ध कर्म में मुक्ति का सिर्फ इतना ही अर्थ है।
ऐसा माना जाता है कि प्रयाग मुक्ति का पहला द्वार है, काशी दूसरा, गया तीसरा और अंतिम ब्रह्मकपाली है। यहां क्रम से जाकर पितरों के प्रति विधिवत किए गए श्राद्ध से मुक्ति मिल जाती है।

श्राद्धकर्म नहीं किया तो क्या होगा?

पितृदोष कैसे लगेगा : यदि श्राद्ध कर्म नहीं किया तो पितृदोष कैसे लगेगा यह सवाल हो सकता है। पितृ दोष दो तरह से निर्मित होता है पहला इस जन्म के कर्म और दूसरा पूर्व जन्म के कर्म से। पूर्व जन्म के कर्म है तो यह कुंडली में स्वत: ही आ जाएंगे। कुंडली में यदि गुरु 10वें भाव में है तो पूर्ण दोष माना जाता है। सातवें घर में गुरु होने पर आंशिक पितृदोष हैं। जीते जी दादा-दादी, पिता-माता और नाना-नानी को सताना, श्राद्ध कर्म नहीं करना, पितृ धर्म को छोड़ना, अपनी संतान को सताना, पीपल के वृक्ष को काटना, गाय को सतना, विष्णु और धर्म का विरोध करना यह सभी पितृदोष में शामिल होंगे।
मरने के बाद पितृलोक के उचित समय में आपके अतृप्त पूर्वज श्राद्धकाल में धरती पर आपके द्वार पर तीन कारणों से आते हैं, पहला यह कि यह देखने की मेरी संतति कैसी है, दूसरा यह कि क्या हमें अन्न-जल मिलेगा, तीसरा यह कि क्या हमारी मुक्ति के लिए कोई कर्म हो रहा है?

अब सवाल यह उठता है कि उपरोक्त लिखी गई बात कितनी सत्य है या कि मनघढंत? इसको जांचने के लिए दो रास्ते हैं। पहला ये कि आप मरकर देख लें कि आप देख सकते हैं कि आप क्या हैं और आपके परिजन आपको नहीं देख पा रहे हैं। भूख लगती है भौतिक शरीर को सूक्ष्म शरीर को नहीं, परंतु भूख के अहसास से ही मृतक अतृप्ति महसूस करता है यह स्थिति लंबे काल तक बनी रहती है। दूसरा यह कि आप वेद और पुराणों में आत्मा की गति के विज्ञान को पढ़ें और समझें।

अन्न से शरीर तृप्त होता है। अग्नि को दान किए गए अन्न से सूक्ष्म शरीर (आत्मा का शरीर) और मन तृप्त होता है। इसी अग्निहोत्र से आकाश मंडल के समस्त पक्षी भी तृप्त होते हैं। तर्पण, पिंडदान और धूप देने से आत्मा की तृप्ति होती है। तृप्त आत्माएं ही प्रेत नहीं बनतीं।

ये क्रिया कर्म ही आत्मा को पितृलोक तक पहुंचने की ताकत देते हैं और वहां पहुंचकर आत्मा दूसरे जन्म की प्रक्रिया में शामिल हो पाती है। जो परिजन अपने मृतकों का श्राद्ध कर्म नहीं करते उनके प्रियजन भटकते रहते हैं। यह कर्म एक ऐसी विधि है जिसके माध्यम से आत्मा को सही मुकाम मिल जाता है और वह भटकाव से बचकर मुक्त हो जाता है। वो व्यक्ति श्राद्धकर्म नहीं करता है वह अपने पितरों के प्रति अन्याय कर रहा है क्योंकि पितृ किसी दूसरे से आशा नहीं करते हैं। उनकी जो गति होना है तो वह तो आपके श्राद्ध नहीं करने से भी हो जाएगी। भले ही थोड़ी देर लेगेगी परंतु उनके मन में आपके प्रति भले ही नफरत ना हो परंतु आप प्रेम और आशीर्वाद की आशा ना करें।
कैसे तृप्त होते पितृ?
अन्न से भौतिक शरीर तृप्त होता है। अग्नि को दान किए गए अन्न से सूक्ष्म शरीर (आत्मा का शरीर) और मन तृप्त होता है। इसी अग्निहोत्र से आकाश मंडल के समस्त पक्षी भी तृप्त होते हैं। तर्पण, पिंडदान और धूप देने से आत्मा की तृप्ति होती है। तृप्त आत्माएं प्रेत नहीं बनतीं। ये क्रिया कर्म ही आत्मा को पितृलोक तक पहुंचने की ताकत देते हैं और वहां पहुंचकर आत्मा दूसरे जन्म की प्रक्रिया में शामिल हो पाती है। जो परिजन अपने मृतकों का श्राद्ध कर्म नहीं करते उनके प्रियजन भटकते रहते हैं। यह कर्म एक ऐसी विधि है जिसके माध्यम से आत्मा को सही मुकाम मिल जाता है और वह भटकाव से बचकर मुक्त हो जाता है।
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जैसे पशुओं का भोजन तृण और मनुष्यों का भोजन अन्न कहलाता है, वैसे ही देवता और पितरों का भोजन अन्न का 'सार तत्व' है। सार तत्व अर्थात गंध, रस और उष्मा। देवता और पितर गंध तथा रस तत्व से तृप्त होते हैं। दोनों के लिए अलग अलग तरह के गंध और रस तत्वों का निर्माण किया जाता है। विशेष वैदिक मंत्रों द्वारा विशेष प्रकार की गंध और रस तत्व ही पितरों तक पहुंच जाती है।
पितरों के अन्न को 'सोम' कहते हैं जिसका एक नाम रेतस भी है। यह चावल, जौ ‍आदि से मिलकर बनता है। एक जलते हुए कंडे पर गुड़ और घी डालकर गंध निर्मित की जाती है। उसी पर विशेष अन्य अर्पित किया जाता है। तिल, अक्षत, कुश और जल के साथ तर्पण और पिंडदान किया जाता है। अंगुलियों से देवता और अंगुठे से पितरों को अर्पण किया जाता है।
पुराणों अनुसार पितरों और देवताओं की योनि ही ऐसी होती है की वे दूर की कही हुई बातें सुन लेते हैं, दूर की पूजा-अन्न भी ग्रहण कर लेते हैं और दूर की स्तुति से भी संतुष्ट होते हैं। इसके सिवा ये भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ जानते और सर्वत्र पहुचते हैं। पांच तन्मात्राएं, मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति- इन नौ तत्वों का बना हुआ उनका शरीर ऐसा ही करने की क्षमता रखता है। जय श्री पितृदेवाय नम:।



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