महाबली राजा बलि के 10 रहस्य, जानिए...

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
बलि फिर छला गया : इधर वैकुण्ठ में सभी देवी-देवता समेत लक्ष्मीजी अत्यंत चिंतित हो गईं। तब इस कठिन काल में नारदजी ने माता लक्ष्मी को एक युक्ति बताई। उन्होंने कहा कि एक रक्षासूत्र लेकर वे राजा बलि के पास अपरिचित रूप में दीन-हीन दुखियारी बनकर जाएं और राजा बलि को भाई बनाकर दान में प्रभु को मांग लाएं।
लक्ष्मीजी राजा बलि के दरबार में उपस्थित हुईं और उन्होंने उनसे आग्रह किया कि वे उन्हें भाई बनाना चाहती हैं। राजन ने उनका प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया और उनसे रक्षासूत्र बंधवा लिया और कहा‍ कि अपनी इच्छा के अनुरूप कुछ भी उनसे मांग लें। लक्ष्मीजी इसी हेतु तो वहां आई थीं।

उन्होंने राजा से कहा कि आप मुझे अपनी सबसे प्रिय वस्तु दे दें। राजन घबरा गए। उन्होंने कहा मेरा सर्वाधिक प्रिय तो मेरा यह प्रहरी है, परंतु इसे देने से पूर्व तो मैं प्राण त्यागना अधिक पसंद करूंगा।

तब लक्ष्मीजी ने अपना परिचय उन्हें दिया और बताया कि मैं आपके उसी प्रहरी की पत्नी हूं जिन्हें उन्होंने बहन माना था। उसके सुख-सौभाग्य और गृहस्थी की रक्षा करना भी उन्हीं का दायित्व था और यदि बहन की ओर देखते तो उन्हें अपने प्राणों से भी प्रिय अपने इष्ट का साथ छोडऩा पड़ता, पर राजन भक्त, संत और दानवीर यूं ही तो न थे।

उन्होंने अपने स्वार्थ से बहुत ऊपर बहन के सुख को माना और प्रभु को मुक्त कर उनके साथ वैकुण्ठ वास की सहमति दे दी, परंतु इसके साथ ही उन्होंने लक्ष्मीजी से आग्रह किया कि जब बहन-बहनोई उनके घर आ ही गए हैं तो कुछ मास और वहीं ठहर जाएं और उन्हें आतिथ्य का सुअवसर दें।

लक्ष्मीजी ने उनका आग्रह मान लिया और श्रावण पूर्णिमा (रक्षाबंधन) से कार्तिक मास की त्रयोदशी तिथि (धनतेरस) तक विष्णु और लक्ष्मीजी वहीं पाताल लोक में राजा बलि के यहां रहे। धनतेरस के बाद प्रभु जब लौटकर वैकुण्ठ को गए तो अगले दिन पूरे लोक में दीप-पर्व मनाया गया।

माना जाता है कि प्रत्येक वर्ष रक्षाबंधन से धनतेरस तक विष्णु लक्ष्मी संग राजा बलि के यहां रहते हैं और दीपोत्सव के अन्य कई कारणों संग एक कारण यह भी है।

अंत में एक महत्वपूर्ण रहस्य...



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