Mahabharat 24 April Episode 55-56 : महाभारत में जब यक्ष ने मारे 4 पांडव

अनिरुद्ध जोशी| Last Updated: गुरुवार, 14 मई 2020 (17:36 IST)
बीआर चौपड़ा की के 24 अप्रैल 2020 के सुबह और शाम के 55 और 56वें एपिसोड में पांडवों के अज्ञातवास में घटी घटना, यक्ष प्रश्न और धृतराट्र के पुत्र मोह के बारे में बताया गया था। इस बीच दुर्योधन अपने गुप्तचरों को पांडवों को ढूंढने के लिए धमकाता है।
सुबह के एपिसोड का प्रारंभ जयद्रथ द्वारा एक वृक्ष के नीचे अपने अपमान से अपमानित होकर ॐ नम: शिवाय का जाप करते हुए बताया गया। उस वक्त दुर्योधन उसके पास आकर कहता है कि यह क्या हाल बना रखा है।

जयद्रथ अपने मुंडे सिर की पांच चोटियां बताकर कहता है कि मित्र दुर्योधन मैं अपना मुंह किसी को नहीं दिखा सकता। ये पांच चोटियां देख रहे हो ना ये पांच सर्प के समान हैं जो दिन-रात मुझे डंसते रहते हैं। दुर्योधन इस घटना के बारे में पूछता है तो जयद्रथ बताता है कि उसकी यह दशा किसने की थी। दुर्योधन उसे अपने साथ चलने के लिए कहता है लेकिन वह मना कर देता है और कहता है कि अभी मैं तपस्या करके महादेव से उन पर (पांडवों पर) विजय प्राप्त करने का वरदान प्राप्त करूंगा। और, वह महादेव की तपस्या करने लगता है।

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माता पार्वती महादेव से पूछती हैं कि आप किस चिंता में हैं महादेव। तब महादेव बताते हैं कि किस तरह जयद्रथ वर मांगने के लिए तप कर रहा है। महादेव कहते हैं कि मैं मांगने वाले को खाली हाथ नहीं जाने देता हूं। अत: उसे कुछ न कुछ तो अवश्य ही दूंगा।

इसके बाद बताते हैं कि किस तरह पांचाली के साथ पांडव वन में भटक रहे हैं और फिर आराम करने के लिए एक वृक्ष के नीचे बैठ जाते हैं। पांचाली को प्यास लगती है। फिर युधिष्ठिर सहदेव को आज्ञा देते हैं कि तुम इस वृक्ष पर चढ़कर देखो कि कहां जल दिखाई दे रहा है। सहदेव वृक्ष पर चढ़ जाता है। इस दौरान वे चर्चा करते हैं कि अज्ञातवास में दुर्योधन हमें किस तरह ढूंढ रहा होगा। फिर वे अज्ञातवास में छिपने की योजना बनाते हैं। इस बीच सहदेव नीचे उतरकर बताता है कि कुछ दूरी पर एक जलाशय है। युधिष्ठिर नकुल को जल लाने का आदेश देते हैं।
नकुल जलाशय के पास पहुंचकर जैसे ही जल पीने लगता है तो आकाशवाणी होती है। सावधान! मेरे प्रश्नों के उत्तर के बिना तुम ये जल नहीं पी सकते। नकुल इसकी परवाह किए बिना जल पी लेता है और अचेत हो जाता है। बहुत देर तक नकुल नहीं लौटता है तो सहदेव को भेजा जाता है। वह भी ऐसा ही करता है। तब अर्जुन को भेजा जाता है। अर्जुन दोनों भाइयों को मृत देखकर क्रोधित होकर चीखता है कि किसने मारा मेरे भाइयों को? सामने आ जाओ। तब यक्ष सामने प्रकट होकर कहता है कि इनकी हत्या मैंने की है। तब अर्जुन और यक्ष का वाद-विवाद होता है। यक्ष बोलता है कि यदि जल चाहिए तो पहले तुम मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, नहीं तो तुम्हारी भी यही दशा होगी।

अर्जुन को क्रोध आता है और वह कहता है कि अब में जल पिऊंगा भी और ले भी जाऊंगा और तुम्हारे इस सरोवर को अपने बाण से सूखा दूंगा। अर्जुन जल पीने जाता है तो यक्ष सावधान करके कहता है, रुक जाओ, पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, लेकिन अर्जुन उसकी परवाह नहीं करता है और जल पी लेता है। तब उसका भी हाल नकुल और सहदेव जैसा हो जाता है।

फिर युधिष्ठिर भीम को भेजते हैं। वह भी जाता है और सरोवर के पास अपने भाइयों को मृत देखकर दंग रह जाता है। तब वह भी‍ चिल्लाकर कहता है कि सामने आ हत्यारे। यक्ष प्रकट हो जाते हैं। भीम कहता है क्या तुम मेरे भाइयों के हत्यारे हो? यक्ष कहते हैं, हां और यदि तुमने भी मेरे प्रश्नों के उत्तर के बगैर जल को हाथ लगाया तो तुम्हारी भी यही दशा होगी। भीम कहता है कि पहले में जल पीकर यह सिद्ध करूंगा कि इस जल पर तेरा कोई अधिकार नहीं। फिर तुम्हें इन हत्याओं का दंड दूंगा। भीम जल पीता है और वह भी अचेत हो जाता है।

अंत में युधिष्ठिर जाते हैं। वे अपने सभी भाइयों को इस तरह अचेत देखकर रोने लगते हैं। वे सोचते हैं कि इन पर किसी घाव का निशान नहीं है, तो क्या इस सरोवर का जल ही विषैला है? फिर वे समझ जाते हैं कि इस सरोवर के जल में अवश्य कुछ न कुछ है। वह भी उस जल को पीने का प्रयास करते हैं, तभी यक्ष उन्हें सावधान कर देते हैं।

ठहरो! जल पीने से पहले मेरे प्रश्नों के उत्तर दो। तब युधिष्ठिर हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं और उस यक्ष से उसका परिचय पूछते हैं। वह कहते हैं कि मैं यक्ष हूं। यक्ष युधिष्ठिर से भी वही बात कहते हैं जो उन्होंने अन्य भाइयों से कही। युधिष्ठिर हाथ जोड़कर कहते हैं कि मैं आपके प्रश्नों के उत्तर देने का प्रयास करूंगा। यक्ष एक-एक करके कई प्रश्न पूछता है और धर्मराज युधिष्ठिर सभी के उत्तर देकर यक्ष को संतुष्ट कर देते हैं।

यक्ष कहते हैं कि भरतश्रेष्ठ आपने मेरे सारे प्रश्नों के सही उत्तर दिए हैं, अत: इसमें से जिस एक को चाहो वह जीवित हो सकता है। तब युधिष्ठिर कहते हैं कि आप नकुल को जीवित कर दें। यक्ष पूछते हैं कि तुमने भीम और अर्जुन को छोड़कर नकुल को ही क्यों चुना? तब युधिष्ठिर कहते हैं कि मेरे लिए माता कुंती और माता माद्री दोनों ही समान हैं। अत: माद्री का एक पुत्र जीवित रहना चाहिए। तब यक्ष कहते हैं कि यदि मैं कहता कि मैं दो भाई जीवित कर दूंगा तब तुम किसका नाम लेते? तब युधिष्ठिर कहते हैं कि तब में सहदेव का नाम लेता, क्योंकि वे भीम और अर्जुन दोनों से छोटे हैं।

युधिष्ठिर की यह बात सुनकर यक्ष प्रसन्न हो जाते हैं और कहते हैं कि मैं तुम्हारे सारे भाइयों को जीवनदान देता हूं। तब युधिष्ठिर कहते हैं कि भगवन आप यक्ष तो हैं नहीं क्योंकि यक्ष किसी को जीवनदान नहीं दे सकते। कृपया बताएं कि आप कौन हैं? तब यक्ष अपने असली रूप में आते हैं और कहते हैं कि मैं धर्मराज हूं।

फिर वे सभी भाई जीवित होकर पांचाली के पास पहुंचते हैं। पांचाली कहती है कि दुर्योधन के गुप्तचर हमें ढूंढते हुए यहां पहुंच गए हैं। तब अर्जुन कहता है कि तुम चिंता न करो और वह
अपने बाण से बादलों में तीर छोड़कर धुंध पैदा कर देता है।

इधर, अभिमन्यु का सुभद्रा से संवाद होता है। अभिमन्यु अपने मामा श्रीकृष्ण के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि इतिहास तुम्हारी प्रतिक्षा कर रहा है। अभिमन्यु कृतवर्मा से शस्त्र सीख रहे होते हैं तभी श्रीकृष्ण वहां पहुंच जाते हैं और वे अभिमन्यु को सीख देते हैं कि युद्ध में कोई किसी का नहीं होता है।

दूसरी ओर, अज्ञातवास में पांडवों को दुर्योधन के गुप्तचर ढूंढ नहीं पाए तो दुर्योधन को क्रोध आ जाता है और वह आदेश देता है कि जाओ फिर से ढूंढो।

इधर, भीष्म का विदुर से चर्चा करना बताया गया है। वे विदुर से पूछते हैं कि क्या तुम जानते हो कि पांडव कहां हैं? विदुर कहते हैं कि वे अज्ञातवास में हैं। फिर भीष्म कहते हैं कि अज्ञातवास के दौरान यदि पांडवों को पहचान लिया गया तो क्या होगा और यदि नहीं पहचाना तो क्या दुर्योधन पांडवों को इंद्रप्रस्थ लौटा देगा। भीष्म विदुर पर इस बात के लिए नाराज होते हैं कि तुम मुझसे बहुत कुछ छुपाते हो। यदि तुम दुर्योधन और शकुनि के वारणात षड्यंत्र को बता देते तो मैं महाराज से इस संबंध में बात करके उन्हें दंड दिलवाता, लेकिन तुम मुझे कुछ नहीं बताते हो विदुर। इस तरह भीष्म कई तरह की बातें विदुर के समक्ष कर अपनी पीड़ा का वर्णन करते हैं।
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शाम के एपिसोड की शुरुआत गांधारी और कुंती के वार्तालाप से होती है। इस बीच वे द्रौपदी को दांव पर लगाए जाने और पांडवों के वनवास पर चर्चा करती हैं। फिर धृतराष्ट्र अपने शयनकक्ष में गांधारी से चर्चा करते हैं पांडवों के अज्ञातवास के बारे में।

फिर धृतराष्ट्र के दरबार में शकुंतला पुत्र भरत उपस्थित होते हैं। वे कहते हैं कि मैं न्याय मांगने आया हूं। दोनों के बीच वर्तमान और भविष्य को लेकर वार्तालाप होता है। भरत धृतराट्र को अपने पुत्र मोह में अंधे होने के बारे में उपदेश देते हैं। वे पांडव के योग्य होने और कौरवों द्वारा अन्याय किए जाने के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि यह मेरे कुल पर कलंक है, अत: आप दुर्योधन को कड़े से कड़ा दंड देकर मेरे साथ न्याय करें। लेकिन धृतराष्ट्र दुर्योधन का ही पक्ष लेकर भरत को ही उपदेश देने लग जाते हैं और कहते हैं कि आप अपने वंशज स्वर्गीय शांतनु के पास क्यों नहीं गए, जिन्होंने स्त्री मोह में अपने पुत्र देवव्रत से सभी अधिकार छीनकर अपने उस पुत्र को दे दिए थे जिसका अभी जन्म भी नहीं हुआ है। तभी वहां पर आकर भीष्म के साथ राजा दुष्यन्त भी धृतराष्ट्र से वाद-विवाद करते हैं।

अंत में धृतराष्ट्र और गांधारी का वार्तालाप होता है, जिसमें धृतराष्ट्र कहते हैं कि पांडव यदि जुए में हार गए तो इसमें मेरा क्या दोष। इसका दंड मेरा पुत्र दुर्योधन क्यों भुगते? गांधारी कहती है कि वे हार नहीं गए थे षड्यंत्र द्वारा हराए गए। गांधारी कहती है कि आप पांडवों को अज्ञातवास से पुन: बुला लें। लेकिन धृतराष्ट्र ऐसा करने से इनकार कर देते हैं।

इधर, पांचों पांडव विराट नगर पहुंच गए। वहां पहुंचकर श्‍मशान में एक वृक्ष पर उन्होंने अपने सभी अस्त्र-शस्त्र छुपा दिए। युधिष्ठिर ने बताया कि मैं राजा विराट के यहां 'कंक' नाम धारण कर ब्राह्मण के वेश में आश्रय लूंगा। उन्होंने भीम से कहा कि तुम 'वल्लभ' नाम से विराट के यहां रसोइए का काम मांग लेना, अर्जुन से उन्होंने कहा कि तुम 'वृहन्‍नला' नाम धारण कर स्त्री भूषणों से सुसज्जित होकर विराट की राजकुमारी को संगीत और नृत्य की शिक्षा देने की प्रार्थना करना तथा नकुल 'ग्रंथिक' नाम से घोड़ों की रखवाली करने का तथा सहदेव 'तंत्रिपाल' नाम से चरवाहे का काम करना मांग ले। सभी पांडवों ने अपने-अपने अस्त्र शस्त्र एक शमी के वृक्ष पर छिपा दिए तथा वेश बदल-बदलकर विराट नगर में प्रवेश किया।

विराट ने उन सभी की प्रार्थना स्वीकार कर ली। विराट की पत्नी द्रौपदी के रूप पर मुग्ध हो गई तथा उसे भी केश-सज्जा आदि करने के लिए रख लिया। द्रौपदी ने अपना नाम सैरन्ध्री बताया। अज्ञातवास के दौरान द्रौपदी को सैरन्ध्री नाम से रानी सुदेशणा की दासी बनना पड़ा था।

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अंत में दुर्योधन अपने गुप्तचरों को धमकाता है और कहता है कि जाओ उन पांडवों को जल्दी से ढूंढो अन्यथा मैं तुम्हें तुम्हारे परिवार सहित मार दूंगा। इधर, विराट नगर में नकुल, सहदेव और भीम की गुप्त मुलाकात बताते हैं। अंत में नर्तक बने अर्जुन को नृत्य सिखाते हुए बताते हैं।



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