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सिंहस्थ की निशा पर टंके शब्दों के सितारे

Simhasth 2016 Ujjain
उज्जैन। विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक पर्व सिंहस्थ अपने भीतर अनेक रंग समेटे हुए है। कहीं दिन के मस्तक पर आध्यात्मिक आहुतियों के यज्ञ हो रहे हैं, तो कहीं सांझ के तट आरतियों के दिए झिलमिला रहे हैं।

इसी क्रम में एक रात सजाने का काम किया अनेक कवियों और शायरों ने। कल्याणी माताजी (अम्मा जी) के शिविर में शनिवार-रविवार की दरमियानी रात एक काव्य संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम धर्म सम्राट् स्वामी श्री करपात्री कल्याण संघ बड़वाह के तत्वावधान में हुआ।
संगोष्ठी में नए कवियों से लेकर अनेक प्रतिष्ठित रचनाकारों व शायरों ने रचनापाठ किया। इसके तहत कभी व्यंग्यों के शब्द बाण चलाए गए, तो कभी गंभीर रचनाओं के माध्यम से अनेक गूढ़ बातों से पर्दा हटाया गया।
 
कवि नेहल चावड़ा ने पढ़ा-
'सनातन हिन्दू धर्म का पर्व है सिंहस्थ,
 पूरे विश्व के लिए गर्व है सिंहस्थ,
 धन्य हुई धरा ये महात्माओं के चरण से, 
सद्भाव अध्यात्म का पर्व है सिंहस्थ।'
 
दिनेश "दर्द" ने शायरी के ज़रिए गुरु-महिमा यूं व्यक्त की-
 'दश्त-ओ-सहरा आपकी परछाइयां हैं सब,
 तुम्हारा नूर हर शय में मुझे महसूस होता है, 
उजाले क्यों तलाशूं मैं जहां में मेरे मालिक,
तुम्हारा नाम लेने से अंधेरा दूर होता है।' 
 
औरंगाबाद (महाराष्ट्र) की अकाल झेल रही धरती से महाकाल-भूमि पर आए कवि सुशील केकान ने राजाधिराज महाकाल के समक्ष अपनी प्रार्थना यूं रखी-
'यह कविता देश के उस हिस्से को समर्पित करता हूं जहां अकाल है, 
क्योंकि मैं जिस नगरी में यह कविता बोल रहा हूँ वहाँ महाकाल है।'
 
सूत्रधार की भूमिका निभा रहे वरिष्ठ कवि सुनील देवड़ा "गाइड" ने भी सिंहस्थ पर महत्वपूर्ण पंक्तियाँ कहीं-
 
 'मोक्षदायिनी क्षिप्रा के तट, संत समागम जय उज्जयिनी,
 पुण्य सलिला क्षिप्रा के तट, संत समागम जय उज्जयिनी। 
 
काव्य की इस संगोष्ठी में हिंदी के साथ-साथ मालवी बोली भी अपनी पूरी क्षमता से मुखर रही। नरेंद्र नखेत्री सहित अनेक कवियों ने श्रोताओं को मालवी की मिठास परोसी। 
 
इसके अलावा सूरज उज्जैनी, अशोक वक़्त, रुस्तम आमिर, नरेंद्र बिड़ला, नईम आफ़ताब, बबलू कारपेंटर, दिनेश दिनकर, नानावटी प्रजापति, धर्मेन्द्र जोशी, शैलेन्द्र जोशी आदि ने अपनी-अपनी रचनाओं से उपस्थितजनों को प्रभावित किया। सरस्वती वंदना सुश्री निर्मला चौहान ने प्रस्तुत की। आभार प्रेम परमानंद ने व्यक्त किया।