गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026
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Written By WD

कविता: वो बचपन की होली

holi
डाॅ. सुषमा रावत चिटनीस 
सुबह-सुबह शरीर पर तेल लगा कर,
सभी मित्रों के द्वार खटखटाकर,
निर्मल मनों में रंगो को घोलकर, 
हर घर से कुछ मीठा, 
कुछ नमकीन खा कर,


 
हिलमिल कर बिताए वो दिन 
अब यादों की तिजोरी के अनमोल हीरे हैं। 
अब न तो मनों के रंग,
एक दूसरे में घुलते हैं,
और होली जलती है,
       विश्वास,वादों और रिश्तों की।