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Written By ND

रामायण में छिपा है अनमोल खजाना

अंदर पसरे 'रावणत्व' का खात्मा जरूरी !

राष्ट्रीय पर्व
- विमलेंदु 'प्रखर'

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हमारी लौकिक संस्कृति में पर्वों का अपना एक विशिष्ट महत्व होता है। वैसे भी, भारत में सांस्कृतिक-सूत्रों का सीधा संबंध मानवीय सरोकारों से होता है। यही वजह कि उत्सवधर्मिता हमारे जीवन का प्रभावी अंग है। पारंपरिक और पौराणिक तौर पर 'एकता में अनेकता' की विविधतापूर्ण संस्कृति भी हमारी जीवन ऊर्जा का जीवंत प्रतीक है। राष्ट्रीय पर्वों के अलावा आध्यात्मिक रूप से विजयादशमी, दीपावली, ईद और होली जैसे पर्वों में भी भारती समाज रचा-बसा रहता है।

विजयादशमी और दीपावली के पर्व को न केवल देश का हिन्दु- समाज ही मनाता है, अपितु दीगर समाज के लोग भी इस उत्सव को उत्साह के साथ मनाते हैं। विजयादशमी के ही दिन श्रीराम ने, दशानन का वध किया था। यही वजह है कि इस पर्व को 'बुराई पर अच्छाई की जीत' के रूप में देखा जाता है। इस संदर्भ में श्रीराम को उनके 'रामत्व' के रूप में तो लंकेश्वर को 'रावणत्व' के रूप में देखा जाता है।

'रामायण', 'महाभारत', 'गीता' एवं 'उपनिषद' जैसे अमर-ग्रंथ हमारे देश को नीति एवं कूटनीति की शिक्षा व संस्कार से संस्कारित करते हैं। दरअसल, हमारी सांस्कृतिक-पृष्ठभूमि न केवल उत्सवधर्मी है, बल्कि यह हमारे रीति-रिवाजों से जुड़ी संस्कारबद्ध कड़ी है।

वास्तव में, हमारे पूर्वजों ने पर्वों और तीज-त्यौहारों का जो चलन चलाया था वह निश्चित तौर पर हमारी सामाजिक मान्यताओं को पुख्ता बनाने की प्रक्रिया ही थी। यही प्रक्रिया आज हमारी संस्कृति का प्रभावी स्वरूप बन चुकी है। भगवान राम को हम मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में मानते हैं। इसके पीछे का सच यही है कि समूचे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उनके चारित्रिक-मानदंड को मर्यादा की सीख का ही पर्याय समझा जाता है।

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'रामायण' एक ऐसा अमूल्य ग्रंथ है जिसमें नीतियों का अनमोल खजाना छिपा हुआ है। 'रामायण' के पात्रों को हम दुनियावी तौर-तरीकों से जब देखते हैं तो हमें अपने ही लौकिक स्वरूप की संरचना साफ-साफ दिखाई पड़ती है। श्रीराम को मर्यादा की प्रतिमूर्ति मानते हुए, हम उन्हें अपना आदर्श चरित्र समझते हैं।

श्रीराम के साथ-साथ लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न जैसे भाइयों ने भी श्रीराम के अंदरूनी संस्कार को अपना आदर्श मान लिया। यही वजह है कि राम को वनवास मिलने के बाद, लक्ष्मण और सीता भी उनके साथ वनवास जाने के लिए तैयार हो गए। लेकिन, कैकयी की कोख से जन्मे भरत ने भी वनवास के बाद राजपाट छोड़कर श्रीराम के खड़ाऊँ को सिंहासन पर रखा और स्वयं मायूस होकर वन-वन भटकते रहे।

आज इसी आदर्श की कमी हमारे समाज को आज भी कचोटती है। समूचा भारतीय समाज अच्छाइयों और बुराइयों की दृष्टि से इस तरह विभाजित है कि हम इसकी खूबियों और कमियों को आसानी से अपने धर्मग्रंथों के जरिए ग्रहण करते हैं।

समूचे राम और रावण युद्ध को हम व्यापक परिप्रेक्ष्य में जब आँकते हैं तो राष्ट्रीय संस्कारों का एक आईना सा हमारे सम्मुख दिखाई देने लगता है। मर्यादा को आधार बनाकर भगवान राम ने जिस तरह के संस्कार अपनी प्रजा और परिजनों में संस्कारित किए हैं, वैसा आदर्श और कहीं देखने को नहीं मिलता।

'रावणत्व' को मिटाकर ही 'रामत्व' के मार्ग पर चल सकते हैं। जरूरी है, आज हम अपने अंदर बुराइयों के प्रतीक के रूप में पसरे 'रावणत्व' को अपने हृदय से निकालकर 'रामत्व' की ओर बढ़ाने का सार्थक प्रयास करें। इसीलिए आज भी हम अपनी सांस्कृतिक उष्मा से सराबोर पर्वों को उसी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाते हैं ताकि हमारी यह सांस्कृतिक परिपाटी हमेशा-हमेशा के लिए बनी रहे।
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