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Last Updated : गुरुवार, 28 मई 2026 (18:05 IST)

अधिकमास की ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत का महत्व, पूजन विधि और शुभ मुहूर्त

The image depicts Lord Vishnu, a prayer plate, a Kalash, and a scripture, with a river, a temple, and a full moon in the background.
हिंदू कैलेंडर के अनुसार, जब कोई महीना दो बार आता है, तो पहले महीने को 'अधिकमास' (मलमास या पुरुषोत्तम मास) कहा जाता है। यह संयोग हर तीन साल में एक बार बनता है। इस साल ज्येष्ठ का महीना अधिकमास है। अधिकमास पूरी तरह भगवान विष्णु को समर्पित होता है, इसलिए 'अधिकमास की ज्येष्ठ पूर्णिमा' (जिसे पुरुषोत्तम पूर्णिमा भी कहते हैं) का धार्मिक महत्व सामान्य पूर्णिमा से कई गुना अधिक हो जाता है। इस साल (2026) आने वाली अधिकमास ज्येष्ठ पूर्णिमा का संपूर्ण विवरण इस प्रकार है।
 

शुभ मुहूर्त और तिथि (2026)

पंचांग के अनुसार, इस बार पूर्णिमा तिथि दो दिनों में बंट रही है, जिसके कारण व्रत और स्नान-दान की तारीखें अलग-अलग हैं:
पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ: 30 मई 2026, शनिवार को सुबह 11:57 बजे से
पूर्णिमा तिथि की समाप्ति: 31 मई 2026, रविवार को दोपहर 02:14 बजे तक
पूर्णिमा व्रत की तिथि: 30 मई 2026 (शनिवार)- इस दिन चंद्रोदय के समय पूर्णिमा तिथि मौजूद रहेगी, इसलिए व्रत रखना और शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देना इस दिन श्रेष्ठ है।
स्नान-दान की पूर्णिमा: 31 मई 2026 (रविवार)- उदयातिथि (सूर्य उदय के समय की तिथि) मिलने के कारण पवित्र नदियों में स्नान और दान-पुण्य करना रविवार को सबसे शुभ रहेगा।
विशेष संयोग (रवि योग व बुधादित्य योग): इस दौरान रवि योग और बुधादित्य योग का निर्माण हो रहा है, जो पूजा-पाठ के फल को और बढ़ा देता है।
 

अधिकमास ज्येष्ठ पूर्णिमा का महत्व

अधिकमास के स्वामी स्वयं भगवान विष्णु (पुरुषोत्तम) हैं। इसलिए इस पूर्णिमा को 'सर्व सिद्धिदायिनी पूर्णिमा' भी कहा जाता है।
महापुण्य की प्राप्ति: शास्त्रों के अनुसार, अधिकमास की पूर्णिमा पर किए गए व्रत, दान और जप का फल कभी नष्ट नहीं होता। यह जीवन के सभी पापों और कष्टों का नाश करता है।
लक्ष्मी-नारायण की कृपा: इस दिन माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की संयुक्त पूजा करने से घर में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती और दरिद्रता दूर होती है।
कुंडली के दोषों से मुक्ति: इस दिन चंद्रमा पूर्ण सोलह कलाओं से युक्त होता है। चंद्रमा को अर्घ्य देने से मानसिक तनाव दूर होता है और कुंडली में 'चंद्र दोष' समाप्त होता है।
 

पूजन विधि (Step-by-Step)

सुबह का स्नान: पवित्र नदी (गंगा, यमुना आदि) में स्नान करें। यदि घर पर स्नान कर रहे हैं, तो नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिला लें।
संकल्प लें: सूर्य देव को जल अर्पित करने के बाद, हाथ में जल और अक्षत लेकर अधिकमास पूर्णिमा व्रत का संकल्प लें।
विष्णु-लक्ष्मी पूजा: पूजा घर में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक जलाएं। भगवान को पीले फूल, पीला चंदन, धूप और अक्षत अर्पित करें।
सत्यनारायण कथा और भोग: इस दिन घर में भगवान सत्यनारायण की कथा करना या सुनना परम फलदायी होता है। भगवान को चरणामृत और तुलसी दल (तुलसी का पत्ता) मिला हुआ पंजीरी का भोग लगाएं।
मंत्र जाप: पूजा के दौरान "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" या "ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्री सिद्ध लक्ष्म्यै नमः" मंत्र का जाप करें।
चंद्र देव को अर्घ्य: शाम को जब चंद्रमा उदय हो (लगभग शाम 07:36 बजे), तब कच्चे दूध, गंगाजल और चीनी मिले जल से चंद्रमा को अर्घ्य दें।
दान का महत्व: अगले दिन सुबह किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को पीले वस्त्र, अन्न (जैसे चना दाल या चावल), फल या सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा का दान अवश्य करें। मालपुए का दान करना अधिकमास में बेहद शुभ माना जाता है।
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वेबदुनिया धर्म-ज्योतिष टीम
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