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Written By WD

शहद भरी मटकी हैं

मनोज सोनकर

शहद
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यादें तो टटकी हैं।
फूल संग चटकी हैं।।

शूलों का छोड़ साथ।
गंध संग भटकी हैं।।

मरहम का रूप धरे।
घाव कई पटकी हैं।।

दीखे ना खटास कहीं।
शहद भरी मटकी हैं।।

बागों की सैर संग।
जूड़े में लटकी हैं।।

(यह ग़ज़ल हिन्दी के तोमर छंद में लिखी गई है।
तोमर के प्रत्येक चरण में 12 मात्राएँ होती हैं।)

साभार : संबोधन