- लाइफ स्टाइल
» - साहित्य
» - काव्य-संसार
यादों के हरसिंगार
सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' ओह मेरेप्रेम के हवामहलविश्वसनीय हो तुमजैसे पतझड़ और प्रकाशमदमस्त मेघों से उमड़ता ऐच्छिक आकाशमेरे तन मेंप्रवेश कर क्यों हलचल मचातेकोंपलों-सा फूट जाना चाहते क्योंपयोधर बनकर मुक्त करतेदुग्ध की बूंदेंचयन करतेलू की गर्मजोशीश्वेत चुनरी हिमकणों कीपहनाते मुझेबिखरकर फैल जातेयादों के हरसिंगारवतन के हाल सुनतेचाँदनी के नूपुरों सेआहटों मेंजोहता मैं बाट तेरीजो अभी है साथ मेरे हलचलों मेंउन उमंगों के सदा दीपक जलाता।आलाप ले मैं द्वार तेरे खटखटाताआँधियों सा उमड़करतूफान गाताअगर तुम्हारे द्वारन खुलते अचानकउमड़ती नदी ले तुमको बहाताकल्पना सेमन कहाँ भरता हमारासाथ रहता जो सदा अपना कहाँ यथार्थ के आँचल तलेसपना कहाँ स्मरण रह पाता नहींन भूल पातापुस्तकों के सम्पुट बनदबा दिया जाता मोरपँख।