काट रहे हम बारी-बारी।
- डॉ. हरीश निगम
आँखें आकाश टँगीऐंठ गईंनदिया की देहगाँव जला धूप मेंमुँह फेरेबादल का नेह,पेड़ फरी चिंताएँपेट में कटारी।बाबा का घर गयादिखी नहींअम्मा की हंसुलीभैया परदेश गएफीकी हैभौजी की टिकुली,दुध-मुँहे उजालों केभाग लिखी अँधियारी।पंख-पंख झरता मनहाँफ गईउम्र की चिरइयाधरती के होंठ फटेकुआँ-कुआँझाँक रही गइया,हवा फिर महाजन-सीजिंदगी उधारी। काट रहे हम बारी-बारी।