ओ सावन के बादल....
पंकज सुबीर की लोकप्रिय रचना
ओ सावन के बादल जाकर देना इतनी सिर्फ निशानी।भैया के हाथों को छूकर देना इन आंखों का पानी॥बाबूजी से पीर मेरी कोई भी मत कह देना सुन ले।कहना गुड्डी बिटिया तो हो गई है अब ससुराल की रानी॥मेरा नाम सुनेंगीं जब तो हुलस-हुलस कर वो रोएंगीं ।अम्मा की आंखों से ममता बह निकलेगी बनकर पानी॥पिंजरे का हीरामन अब भी गुड्डी-गुड्डी रटता होगा।कह देना तेरी वो गुड्डी हो गई है अब बहू सयानी॥घर के इक कोने में मेरी गुड़िया भी रक्खी हो शायद।कहना याद बहुत आती है तेरी लाड़ो बिटिया रानी॥अमरूदों के बाग में जाकर माली काका से कहना ये।चोरी के अमरूदों की यादें हैं अब तो सिर्फ कहानी॥पिछवाड़े के नीम पे झूला डाला होगा काकाजी ने।उस झूले पर बैठ हुमकना पुरवैया होगी मस्तानी॥नदिया के कानों में थोड़ा शरमा कर ये बतला देना।आते माघ पूस तक बन जाएगी तू अम्मा से नानी॥आंगन के तुलसी चौरे पर कर आना तू संजा बाती।और कहना आशीष बनाए रखना तुलसी माता रानी।।