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Written By स्मृति आदित्य

एक बार पुकारों

फाल्गुनी

पुकारों
ND
इस रात के आँचल में सजे
हर सितारे के बीच में,
इस रात पर लगी
चाँद बिंदिया के नीचे,
और महकती रात की रानी की
गहरी खुशबू में
मैं ढूँढती हूँ तुम्हें
यह जानते हुए कि
तुम अब कहाँ,
कहीं भी तो नहीं,
ओ निर्मोही,
एक बार पुकारों
प्यार के लिए नहीं
तो यूँ ही सही,
इस पूरी रात में मैं अकेली रही।