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कविता : हम फिर से आएंगे तेरे शहर को बसाने

Updated: गुरुवार, 3 सितम्बर 2020 (15:01 IST)
हम फिर से आएंगे तेरे शहर को बसाने
पर आज तुम न देखो, हमारे पैरों पर पड़े छाले
क्यों आंखें भर आईं हमारी, क्या-क्या हम पर है बीता
यह न पूछो कि क्या है कहानी और क्या है फसाने 
तेरा शहर क्यों है छोड़ा, क्यों हो गए हैं हम रुख़सत
चर्चा करोगे इसकी तो रोने लगेंगे सारे 
तेरे आशियां को सजाने हम फूल बन कर आए 
कभी हमने यह न देखा कितने डाल पर लगे हैं कांटे
तेरा शहर मुस्करा सके इसलिए हम हैं रोए
बन सके तुम्हारा सुंदर आशियां दुःख दर्द हमने काटे
रात को हमने स्वप्न देखा भर पेट खाने का
पर सुबह जब हम जागे तो मुंह से छिन चुके थे निवाले
इस राज को छुपाएं, हम चले जा रहे हैं
हम मुश्किलों से दो-दो हाथ किए जा रहे हैं।

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लेखक के बारे में
राकेशधर द्विवेदी

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