मेरा भी तो फर्ज है
- शशींद्र जलधारी
नगाड़ा चुनाव का बजते ही, कवि मन मचलने लगता है, नेताओं का राग-प्रशंसा, गुंजित होने लगता है। ऐसे में, मैं कैसे रहूँ चुप, आखिर हूँ मैं सजग नागरिक, सोए वोटर को जगाने का, मेरा भी तो फर्ज बनता हैनगाड़ा चुनाव का बजते ही, कवि मन मचलने लगता है।सारे दल और सारे नेता, झूठे ख्बाव दिखाते हैं, थोथे नारों-थोथे वादों से जन-मन भरमाते हैं। वोट की कीमत बतलाने का मेरा जिम्मा बनता है, नगाड़ा चुनाव का बजते ही, कवि मन मचलने लगता है। उजली छवि दिखाने की कोशिश करते काले चेहरे, काले धन से लूटालूम हैं नेताजी के बैग भरे। असलियत इनकी उजागर करने, जी मेरा अकुलाता है, नगाड़ा चुनाव का बजते ही, कवि मन मचलने लगता है। चुनाव आते ही नेताजी में सेवा भाव जाग उठता है, हर नेता खुद को सच्चा जनसेवक बतलाने लगता है। इनका दोहरा आचरण मेरे मन को नहीं सुहाता है, नगाड़ा चुनाव का बजते ही, कवि मन मचलने लगता है। साभार - मन तरंग काव्य संग्रह