को बनने में ढाई दिन का वक्त लगा था, इसलिए इसे अढ़ाई-दिन का झोपड़ा कहा गया। बहुत से लोग ये मानते हैं कि, चूँकि हर साल यहाँ ढाई साल का मेला लगता था, इसलिए इसे यह नाम दिया गया। पहले यह संस्कृत कॉलेज था लेकिन मोहम्मद गौरी ने इसे 1198 में मस्जिद में तब्दील कर दिया और इसका निर्माण और बेहतर तरीके से करवाया। इस मस्जिद की डिजाइन अबु बकर ने तैयार की थी। मस्जिद का अंदरूनी हिस्सा किसी मस्जिद की तुलना में मंदिर की तरह दिखता है।
जमाली कमाली मकबरा : इस मस्जिद की हाल ही में मरम्मत की गई है। इस मस्जिद के निर्माण का कार्य सिकंदर लोदी के शासनकाल में 1528 ईसवी में हुआ था और लगभग 1536 में हुमाऊँ के शासनकाल में खत्म हुआ। जमाली एक सूफी संत थे और सिकंदर लोदी के दरबार में थे और हुमाऊँ के शासनकाल में उनकी मौत हुई थी। यह मकबरा मस्जिद के पीछे स्थित है और एक छोटे से हिस्से में बना है, लेकिन जैसे ही इसकी दीवारों और छत पर नजर जाती है यह काफी आकर्षक दिखता है। जामी मस्जिद या शाहजहाँ का मस्जिद : अजमेर स्थित जामी मस्जिद को शाहजहाँ का मस्जिद भी कहते हैं। यह मस्जिद लगभग 45 मीटर लंबी है, जिसकी 11 मेहराबें हैं। इस मस्जिद को बनाने के लिए मकराना से पत्थर मँगवाए गए थे।