indian surname history | उपनाम में छुपा है पूरा इतिहास
- अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'
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भारत में यदि उपनाम के आधार पर किसी का इतिहास जानने जाएँगे तो हो सकता है कि कोई मुसलमान या दलित हिंदुओं के क्षत्रिय समाज से संबंध रखता हो या वह ब्राह्मणों के कुनबे का हो। लेकिन धार्मिक इतिहास के जानकारों की मानें तो सभी भारतीय किसी ऋषि, मुनि या मनु की संतानें हैं, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, वर्ण या रंग का हो।
वंश बनी जाति : वैदिक काल में तो कोई उपनाम नहीं होते थे। स्मृति काल में वंश पर आधारित उपनाम रखे जाने लगे, जैसे पूर्व में दो ही वंश थे- सूर्यवंश और चंद्रवंश। उक्त दोनों वंशों के ही अनेकों उपवंश होते गए। यदुवंश और नागवंश दोनों चंद्रवंश के अंतर्गत माने जाते हैं। अग्निवंश, इक्ष्वाकु वंश सूर्यवंश के अंतर्गत हैं। सूर्यवंशी प्रतापी राजा इक्ष्वाकु से इक्ष्वाकु वंश चला। इसी इक्ष्वाकु कुल में राजा रघु हुए जिसने रघुवंश चला।
बदलते उपनाम : कई ऐसे उपनाम है जो किसी व्यक्ति या समाज द्वारा प्रांत या धर्म बदलने के साथ बदल गए हैं। जैसे कश्मीर के भट्ट और धर जब इस्लाम में दीक्षित हो गए तो वे अब बट या बट्ट और डार कहलाने लगे हैं। दूसरी और चौहान, यादव और परमार उपनाम तो आप सभी ने सुना होगा। जब ये उत्तर भारतीय लोग महाराष्ट्र में जाकर बस गए तो वहाँ अब चव्हाण, जाधव और पवांर कहलाते हैं। पांडे, पांडेय और पंडिया यह तीनों उपनाम ब्राह्मणों में लगते हैं। अलग-अलग प्रांत के कारण इनका उच्चारण भी अलग हो चला।
कामन उपनाम : नाम की तरह बहुत से ऐसे उपनाम है जो सभी धर्म के लोगों में एक जैसे पाए जाते हैं जैसे पटेल, शाह, राठौर, राणा, सिंह, शर्मा, स्मिथ आदि। चौहान और ठाकुर उपनाम कुछ भारतीय ईसाई और मुसलमानों में भी पाया जाता है। बोहरा या वोहरा नाम का एक मुस्लिम समाज है और हिंदुओं में वराह और बोहरा उपनाम का प्रयोग भी होता है। दाऊदी बोहरा समाज के सभी लोग भारतीय गुजराती समाज से हैं।
पदवी बने उपनाम, उपनाम बने जाति : राव, रावल, महारावल, राणा, राजराणा और महाराणा यह भी उपाधियाँ हुआ करती थी राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में। अन्य भी कई पदवियाँ है जैसे शास्त्र पढ़ने वालों को शास्त्री, सभी शास्त्रों के शिक्षक को आचार्य, दो वेदों के ज्ञाता को द्विवेदी, चार के ज्ञाता चतुर्वेदी कहलाते थे। उपाध्याय, महामहोपाध्याय उपाधियाँ भी वेदों के अध्यन या अध्याय पर आधारित होती थी। अंग्रेजों के काल में बहुत सी उपाधियाँ निर्मित हुई, जैसे मांडलिक, जमींदार, मुखिया, राय, रायबहादुर, चौधरी, पटवारी, देशमुख, चीटनीस, पटेल इत्यादि।
'ठाकुर' शब्द से कौन परिचित नहीं है। सभी जानते हैं कि ठाकुर तो क्षत्रियों में ही लगाया जाता है, लेकिन आपको जानकर शायद आश्चर्य हो कि यह ब्राह्मणों में भी लगता है। ठाकुर भी पहले कोई उपनाम नहीं होता था यह एक पदवी होती थी। लेकिन यह रुतबेदार वाली पदवी बहुत ज्यादा प्रसिद्ध हुई। खान, राय, राव, रावल, राणा, राजराणा और महाराणा यह भी उपाधियाँ या पदवी हुआ करती थी।
भारत के प्रसिद्ध उपनाम : सिंह, ठाकुर, शर्मा, तिवारी, मिश्रा, खान, पठान, कुरैशी, शेख, स्मिथ, वर्गीस, जोशी, सिसोदिया, वाजपेयी, गाँधी, राठौर, पाटिल, पटेल, झाला, गुप्ता, अग्रवाल, जैन, शाह, चौहान, परमार, विजयवर्गीय, राजपूत, मेंडल, यादव, कर्णिक, गौड़, राय, दीक्षित, भट्टाचार्य, बनर्जी, चटर्जी, उपाध्याय, डिसूजा, अंसारी, कुशवाह, पोरवाल, भोंसले, सोलंकी, देशमुख, आपटे, प्रधान, जादौन, जायसवाल, गौतम, भटनागर, श्रीवास्तव, निगम, सक्सेना, चौपड़ा, कपूर, कुलकर्णी, चिटनीस, वाघेला, सिंघल, पिल्लई, स्वामी, नायर, सिंघम, गोस्वामी, रेड्डी, नायडू, दास, कश्यप, पुराणिक, दासगुप्ता, सेन, वर्मा, चौधरी, कोहली, दुबे, चावला, पांडे, महाजन, बोहरा, काटजू, आहूजा, नागर, भाटिया, चतुर्वेदी, चड्डा, गिल, सहगल, टुटेजा, माखिजा, नागौरी, जैदी, टेगोर, भारद्वाज, महार, कहार, सुर्यवंशी, शेखावत, राणा, कुमार, धनगर, डांगे, डांगी, अहमद, सुतार, विश्वकर्मा, पाठक, नाथ, पंडित, आर्य, खन्ना, माहेश्वरी, साहू, झा, मजूमदार आदि।
शर्मा और मिश्रा : शर्मा ब्राह्मणों का एक उपनाम है। दक्षिण भारत और असम में यह सरमा है। वक्त बहुत कुछ बदल देता है, लेकिन उपनाम व्यक्ति बदल नहीं पाता, इसीलिए बहुत से भारतीय ईसाइयों में शर्मा लगता है। जम्मू-कश्मीर के कुछ मुस्लिम भी शर्मा लगाते हैं। कुछ जैन और बौद्धों में भी शर्मा लगाया जाता है। वर्तमान में भारत में शर्मा उपनाम और भी कई अन्य समाज के लोग लगाने लगे हैं। शर्मा उत्तर और पूर्वात्तर भारतीय लोग हैं जिनकी बसाहट उत्तर-पश्चिम भारत से नेपाल तक रही है।
खान और पठान : चंगेज खाँ या खान का नाम आपने सुना ही होगा। वह मंगोलियाई योद्धा था उसके बाद ही खान शब्द का उपयोग भारत में किया जाने लगा। मान्यता यह भी है कि मध्य एशिया में मुलत: यह 'हान' हुआ करता था किंतु यह शब्द बिगड़कर खान हो गया।
वैसे तो खान उपनाम तुर्क से आया है जिसका अर्थ शासक, मुखिया या ठाकुर होता है। यह एक छोटे क्षेत्र का मुखिया होता है। भारत में मुगल काल में 100 भारतीय मुसलमानों या मुस्लिम परिवारों पर एक 'खान' नियुक्त किया जाता था। जब इन नियुक्त किए गए लोगों की तादात बढ़ती गई तो धीरे-धीरे जिसके जो भी उपनाम रहे हों, वह तो छूट गए अब खान ही उपनाम हो गया।
सिंह इज किंग : सिंह, सिंग, सिंघ, सिंघम, सिंघल, या सिन्हा सभी शब्द का उपयोग हिंदू तथा सिक्खों में किया है। मूलत: सिंह शब्द के ही बाकी सभी शब्द बिगड़े हुए रूप है। सिंह को नाम या उपनामों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, लेकिन बहुत से लोग इसका उपनाम के रूप में प्रयोग करते हैं। हालाँकि इस शब्द का इस्तेमाल क्षत्रियों के अलावा भी अन्य कई समाज के लोग करते हैं, क्योंकि यह शब्द उसी तरह है जिस तरह की कोई अपने नाम के बाद 'कुमार' या 'लाला' लगा ले। बब्बर शेर को सिंह कहा जाता है। अब तो सिंह इज किंग है।
भारत में नामों का बहुत होचपोच मामला है। बहुत से गोत्र तो उपनाम बने बैठे हैं और बहुत से उपनामों को गोत्र माना जाता है। अब जैसे 'भारद्वाज' नाम भी है, उपनाम भी है और गोत्र भी। जहाँ तक सवाल गोत्र का है तो भारद्वाज गोत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और दलितों चारों में लगता है। जिस किसी का भी भारद्वाज गोत्र है तो यह माना जाता है कि वह सभी ऋषि भारद्वाज की संतानें हैं। अब आप ही सोचें उनकी संतानें चारों वर्ण से हैं।

