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Written By ND

अंदर की आवाज सुनो

एमएसएन
- अनुराग तागड़े

ND
कई बार हम आवश्यक कार्य करने के पहले अपने आप से कई प्रकार के प्रश्न पूछते हैं। इन प्रश्नों में कार्य की सफलता से लेकर असफलता और कई और बातें भी शामिल रहती है। व्यक्ति स्वयं से प्रश्न पूछते समय स्वयं की सकारात्मक बातों को पहले रखता है, पर भीतर ही भीतर नकारात्मक परिदृश्य भी उमड़ता रहता है। इस कारण कई बार व्यक्ति सफलता निश्चित होने के बावजूद असफलता हाथ लगती है।

असफलता मिलने के बाद व्यक्ति सोचने लगता है और फिर उन बातों को याद करने लगता है, जब उसके मन में असफलता की बातें घूम रही थीं। दरअसल अपने भीतर की आवाज सुनने के लिए व्यक्ति को काफी सजग रहना पड़ता है, क्योंकि मन तो मन है, उसमें विचारों का प्रवाह चलता रहता है और लगातार चलता है। इन विचारों में से स्वयं के व्यक्तित्व और स्वभाव के अनुरूप क्या ठीक हो सकता है, इसका चयन करना जरूरी है।

इन विचारों में सकारात्मकता और नकारात्मकता रहती है और व्यक्ति को दोनों विचारों में से स्वयं के अनुरूप विचारों का चयन करना होता है। इन विचारों का न केवल चयन करना होता है, बल्कि उसका मनन भी करना होता है। कई बार युवा साथी इंटरव्यू के लिए जाते हैं और असफलता मिलने पर इंटरव्यू लेने वाले पर या कंपनी पर ही आरोप जड़ देते हैं, जबकि गलती उनकी स्वयं की होती है और वे जानते हैं कि गलती अपनी ही है, पर स्वयं गलती मानने को कौन तैयार होता है।

लिहाजा कंपनी ही गलत है, ऐसा प्रचार करते हैं। अगर ध्यान से देखा जाए तब यह तथ्य सामने आता है कि चाहे इंटरव्यू हो या फिर अन्य कार्य हो, आपको स्वयं के आत्मविश्वास व कार्य की सफलता के बारे में पता होता है और यह पता भीतर से ही चलता है। भीतर की आवाज सुनना कोई आध्यात्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह सामान्य प्रक्रिया है और सभी इस तरह से सोचते हैं और भीतर की आवाज सुनते हैं।

इसका मतलब यह भी नहीं कि व्यक्ति प्रयत्न ही न करे और असफलता मिलने की आशा है, इस कारण कोई कार्य ही न करे। कार्य करे और अपनी ओर से पूर्ण मेहनत के साथ कार्य करे, पर अगर मन में जरा-सी भी शंका हो तब उस शंका का निवारण जरूरी है, क्योंकि यह मन ही है, जो आपको सच से साक्षात्कार करवाता है और सत्य बात आपके सामने बिना लाग लपेट के रखता है।

अगर आपने मन के विचारों को मारना आरंभ कर दिया तब सत्य बात आपके सामने नहीं आएगी और स्वयं से ही झूठ बोलने लगते हैं। यह स्थिति मनमर्जी की होती है। दरअसल प्रयत्न और भीतर की आवाज सुनने में एक तरह से संतुलन बैठाना होता है और जिसने सही तरीके से संतुलन बिठा लिया, उसकी सफलता की दर बढ़ने की संभावना रहती है, क्योंकि वह अपनी गलतियों को स्वयं के सामने रखने का माद्दा रखता है।