बिस्किट, मसाले, तेल, शैंपू और साबुन की बिक्री क्यों गिर रही है



-दिनेश उप्रेती
"पहले भी बहुत मुनाफ़ा तो नहीं था, लेकिन छह-आठ महीने से तो दुकान का ख़र्चा तक निकालना भारी पड़ रहा था....क्या करता? दुकान बंद कर अब प्राइवेट नौकरी कर रहा हूँ।"
नोएडा के एक पॉश इलाक़े से सटी कॉलोनी में एक जानी-मानी कंपनी के सामानों की रिटेल शॉप चलाने वाले सुरेश भट्ट बड़ी मायूसी से अपना दर्द बयां करते हैं। 32 साल के सुरेश ग्रेजुएट हैं और तमाम कोशिशों के बावजूद सरकारी नौकरी हासिल करने में नाकाम रहने के बाद उन्होंने घरवालों और दोस्तों की मदद से कुछ लाख रुपये इकट्ठे कर कंपनी की रिटेलरशिप हासिल की थी।

सुरेश कहते हैं, "शुरू-शुरू में तो ठीक रहा। ठीक नहीं...मैं कहूंगा बहुत अच्छा रहा। ग्राहक न मोल-भाव करते थे और सामान भी खूब बिकता था... कई बार तो डिमांड ज़्यादा रहती थी और हमें पीछे से सप्लाई ही नहीं मिलती थी। लेकिन धीरे-धीरे मंदा पड़ने लगा।"
उनका दावा है कि उनकी ही नहीं शहर भर में उनके जैसी कई दुकानों पर या तो ताला पड़ गया है या फिर दुकानदारों ने इस स्पेशल सेगमेंट के अलावा और भी सामान अपनी दुकानों पर बेचना शुरू कर दिया है।

एफएमसीजी सेक्टर का दर्द : सुरेश की इस कहानी में एफ़एमसीजी सेक्टर का दर्द छिपा है। जिसमें जानकार मंदी से तो इनकार कर रहे हैं, लेकिन उनका कहना है कि ग्रोथ में स्पीडब्रेकर ज़रूर आ गए हैं। सिर्फ़ एफ़एमसीजी सेक्टर में ही गंभीर हालात नहीं हैं। पिछले कुछ दिनों के अख़बारों पर नज़र डालें तो नॉर्दर्न इंडिया टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन का एक विज्ञापन कई अख़बारों में प्रमुखता से छपा है।
विज्ञापन में दावा किया गया है कि 'भारतीय स्पिनिंग उद्योग बेहद बुरे दौर से गुजर रहा है और इसका नतीजा ही है कि बड़े पैमाने पर लोगों की नौकरियां जा रही हैं।' ख़बरें तो ये भी थी कि ऑटो और माइनिंग सेक्टर की तरह एफ़एमसीजी सेक्टर में काम कर रहे लोगों पर भी छंटनी की तलवार लटक रही है।

'धीमापन ज़रूर आया है, लेकिन ग्रोथ रुकी नहीं' : कहा गया था कि पार्ले जी आने वाले समय में अपने 10 हज़ार कर्मचारियों की छंटनी तक कर सकती है, हालांकि बाद में कंपनी ने इस ख़बर का खंडन यह कहते हुए कर दिया कि अभी ऐसे हालात नहीं बने हैं, "सेक्टर की ग्रोथ में धीमापन ज़रूर आया है, लेकिन ग्रोथ रुकी नहीं है।"
'लोग 5 रुपए की क़ीमत वाला बिस्किट भी नहीं ख़रीद रहे हैं।' ये बयान किसी सियासी पार्टी के प्रवक्ता या नेता का नहीं बल्कि फ़ास्ट मूविंग कंज़्यूमर गुड्स यानी एफ़एमसीजी सेक्टर की दिग्गज़ कंपनी ब्रिटानिया के प्रबंध निदेशक का वरुण वैरी का है, जो पिछले दिनों सुर्खियां बना था। यही नहीं, पार्ले के बिस्किट सेगमेंट के प्रमुख मयंक शाह ने भी वैरी के सुर में सुर मिलाकर सेक्टर पर मंडरा रहे ख़तरे का संकेत दिया।
तो क्या वाक़ई लोगों की जेबें इतनी हल्की हो गई हैं कि उन्हें पांच रुपए का बिस्किट का पैकेट ख़रीदने के लिए दो बार सोचना पड़ रहा है। सिर्फ़ बिस्किट ही नहीं चायपत्ती, मसाले, टूथपेस्ट, साबुन, तेल, शैंपू, डिटर्जेंट जैसे रोज़मर्रा में इस्तेमाल होने वाले सामान बेचने वाली इन कंपनियों की ग्रोथ का ग्राफ़ दिखा रहा है कि कुछ न कुछ गड़बड़ तो कहीं ज़रूर है।

दरअसल, अप्रैल-जून तिमाही में एफ़एमसीजी कंपनियों ने अपनी कमाई और ख़र्च का जो लेखा-जोखा पेश किया है, उसका विश्लेषण करने वालों का कहना है कि ग्रोथ में धीमापन कहीं कुछ ख़ास क्षेत्रों में है।
कहां दिख रही है गड़बड़ : मसलन, इन कंपनियों की कुल बिक्री में अमूमन 40 फ़ीसदी हिस्सा ग्रामीण इलाकों से आता है और ज़्यादातर परेशानी वहीं से है।

इंडिया ट्रेड कैपिटल के ग्रुप चेयरमैन सुदीप बंदोपाध्याय कहते हैं, "साल 2018 में ग्रामीण इलाकों में एफ़एमसीजी उत्पादों की मांग शहरी इलाकों के मुक़ाबले डेढ़ गुना अधिक थी, लेकिन अब ये फ़ासला पट गया है। वजह कई हैं, लेकिन सबसे बड़ी वजह ये है कि कई राज्यों में पिछले एक साल में सूखे जैसी स्थिति रही है और इससे कृषि आधारित आय घटी है। उत्तर और पश्चिमी भारत के बाज़ारों में एफ़एमसीजी उत्पादों की मांग घटी है, जबकि पूर्वी और दक्षिणी भारत में हालात ऐसे नहीं हैं।"
बंदोपध्याय का मानना है कि नामचीन एफ़एमसीजी कंपनियों को लोकल कंपनियों से भी कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है। वो कहते हैं, "बिस्किट, पैकेज्ड फूड, खाद्य तेल सेगमेंट में लोगों के पास कुछ सस्ते विकल्प भी मौजूद हैं। ई-कॉमर्स साइटों पर डिस्काउंट वॉर ने भी बड़ी कंपनियों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।"

नीलसन होल्डिंग की हाल ही में जारी रिपोर्ट में भी कहा गया है कि एफ़एमसीजी सेक्टर की छोटी क्षेत्रीय कंपनियों ने पिछले साल सितंबर तक 28 फ़ीसदी की ग्रोथ हासिल की थी, जबकि शेयर बाज़ार में लिस्टेड कंपनियों के लिए ग्रोथ का ये आंकड़ा 12 फ़ीसदी से आगे नहीं बढ़ सका।
रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण उपभोक्ताओं की तंग होती जेब का असर ये रहा कि इस साल की अप्रैल-जून तिमाही में एफ़एमसीजी की ग्रोथ 10 फ़ीसदी तक गिरी है।

तो अगर कंपनियों की बिक्री पर असर पड़ा है और ये घट रही है तो, क्या इन कंपनियों के कर्मचारी इससे बेअसर हैं। हिंदुस्तान यूनिलीवर के गोवा स्थित प्लांट में काम कर रहे एक स्थाई कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इस 'धीमेपन' से स्थाई कर्मचारी तो अभी तक बचे हुए हैं, लेकिन कई अस्थाई कर्मचारियों के कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म कर दिए गए हैं और कंपनी का ज़ोर इनहाउस उत्पादन बढ़ाने पर है।
क्या मंदी आने की बात सही है? : एफ़एमसीजी सेक्टर में धीमापन कोई हैरान करने वाला नहीं है। पिछले कुछ समय से और ख़ासकर इस साल की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पादन यानी जीडीपी की विकास दर महज 5.8 फ़ीसदी रही, जबकि इसी दरम्यान ये पड़ोसी देश चीन में 6.4 फ़ीसदी पर थी। मंदी की बात भले ही अभी दूर की कौड़ी लगती हो, लेकिन अर्थव्यवस्था में धीमेपन का दर्द, ये जानकार मान रहे हैं।

साल 2017 में 14 साल बाद भारत की क्रेडिट रेटिंग बढ़ाने वाली एजेंसी मूडीज़ को भी भारतीय अर्थव्यवस्था में पहले जैसा आकर्षण नहीं दिख रहा और वो 2019 का जीडीपी ग्रोथ अनुमान तीन बार संशोधित कर चुकी है। पहले उसने इसके 7.5 फ़ीसदी रहने का अनुमान जताया था, जबकि फिर इसे घटाकर 7.4 फ़ीसदी किया, फिर 6.8 फ़ीसदी और अब इसके 6.2 फ़ीसदी की दर से बढ़ने का अनुमान लगा रही है।
आईएमएफ़, एडीबी ने भी घटाया भारत के ग्रोथ रेट का अनुमान : मूडीज़ ही नहीं, हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ और एशियन डेवलपमेंट बैंक यानी एडीबी ने भी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय हालात को देखते हुए भारत का ग्रोथ अनुमान घटा दिया है। आईएमएफ़ को जहां इस साल भारत की जीडीपी ग्रोथ 7 फ़ीसदी के क़रीब बढ़ती नज़र आ रही है, वहीं एडीबी ने भी अपना अनुमान घटाकर सात फ़ीसदी कर दिया है।
अर्थव्यवस्था के इस हाल से मोदी सरकार भी वाकिफ़ है और यही वजह है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पिछले कुछ दिनों से लगातार एक्शन मोड में हैं। बैंकिंग सेक्टर में पूंजी डालने के ऐलान के अलावा उन्होंने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों पर बढ़ाए गए सरचार्ज को वापस ले लिया। बजट में सरकार ने सुपररिच पर सरचार्ज 15 फ़ीसदी से बढ़ाकर 25 फ़ीसदी कर दिया था। इसकी जद में कई एफ़पीआई भी आ गए थे और उन्होंने जुलाई और अगस्त में शेयरों में जमकर बिकवाली की थी।
इसके अलावा सरकार ने बाज़ार में और पूंजी डालने का रास्ता भी खोज लिया है। सरकार को भारतीय रिज़र्व बैंक से लाभांश और अधिशेष पूंजी के रूप में पौने दो लाख करोड़ रुपए से अधिक की रकम मिलेगी, जिससे आर्थिक सुस्ती को दूर करने में मदद मिल सकती है।


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