हिंदू 'प्रलय' की धारणा कितनी सच?

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श्रीमद्भागवत की मान्यता : हिन्दू धर्म ग्रंथ श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि प्रलय का वक्त आने पर सौ साल तक बारिश नहीं होती। अन्न और पानी न होने से अकाल पड़ जाता है। सूर्य की भीषण गर्मी समुद्र, प्राणियों और पृथ्वी का रस सोख लेती है। इसे ही प्रतीक रूप में संकषर्ण भगवान के मुंह से निकलने वाली आग की लपटें बताया गया है। हवा के कारण यह आकाश से लेकर पाताल तक फैलती हैं।

इस प्रचण्ड ताप और गर्मी से पृथ्वी सहित पूरा ब्रह्माण्ड ही दहकने लगता है। इसके बाद गर्म हवा अनेक सालों तक चलती है। पूरे आसमान में धुंआ और धूल छा जाते हैं। जिसके बाद बने बादल आकाश में मण्डराते हुए फट पड़ते हैं। कई सालों तक भारी बारिश होती है।

इससे ब्रह्माण्ड में समाया सारा संसार जल में डूब जाता है। इस तरह पृथ्वी के गुण, गंध जल में मिल जाते हैं और पृथ्वी तबाह होकर अंत में जल में ही मिलकर जल रूप हो जाती है। इस तरह जल, पृथ्वी सहित पंचभूत तत्व जो इस जगत का कारण माने गए हैं, एक-दूसरे में समा जाते हैं और मात्र प्रकृति ही शेष रह जाती है।

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
हिंदू धारणा यह है कि संपूर्ण ब्रह्मांड में निरंतर कहीं न कहीं नित्य या नैमित्तिक प्रलय चलता रहता है, इस दौरान अनेक धरतियाँ जन्मती और काल के गर्त में समा जाती हैं। जिस तरह प्रलय होता रहता है, उसी तरह नए-नए ब्रह्मांड भी सृजित होते रहे हैं
महाभारत : महाभारत में कलियुग के अंत में प्रलय होने का जिक्र है, लेकिन यह किसी जल प्रलय से नहीं बल्कि धरती पर लगातार बढ़ रही गर्मी से होगा। महाभारत के वनपर्व में उल्लेख मिलता है कि सूर्य का तेज इतना बढ़ जाएगा कि सातों समुद्र और नदियां सूख जाएगी। संवर्तक नाम की अग्रि धरती को पाताल तक भस्म कर देगी। वर्षा पूरी तरह बंद हो जाएगी। सब कुछ जल जाएगा, इसके बाद फिर बारह वर्षों तक लगातार बारिश होगी। जिससे सारी धरती जलमग्र हो जाएगी। अनंत काल के बाद पुन: जीवन की शुरुआत होगी।



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