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Written By WD

जमाना ग्लोबेलाइजेशन का !

अखबार काका
काका- अरे भई वेबू क्या कर रहे हो?

वेबू - अखबार पढ़ रहा था । कहो कैसे आए?

काका - बस यूँ ही ! और क्या लिखा है कुछ नया ताजा?

वेबू - ढेर सारे सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल को भारत लौटकर आना पड़ रहा है।

काका - अरे उसमें दुःख की बात क्या है। आजकल ग्लोबेलिटी का जमाना है। यह तो शुरुआत थी। जैसे मौसम अनुकूल पाने के लिए विदेशी पक्षी भारत आते-जाते रहते हैं ऐसे ही विश्व में जहाँ अनुकूल परिस्थितियाँ दिखें वहाँ उड़कर चले जाओ।
लंबी उड़ान उड़ना तो सीख ही गए हो। फिर चिंता किस बात की?

वेबू - मेनका गाँधी के प्रयास रंग लाए। मदारियों की सड़कों पर से छुट्टी हो गई है।

काका - अरे कहाँ छुट्टी हो गई? देखो सड़क से उठकर संसद तक पहुँच गए ।
तहलका की डुगडुगी बजाकर तहलका वालों ने सभी पार्टी वालों को कैसा नाच नचाया । हा हा! आगे तुम जानते ही हो ।

वेबू - दो करो़ड़ की ब्राउन शुगर पकड़ी गई ।

काका - अरे ब्राउन शुगर काहे की दो करोड़ की । यदि वह अवैध और हानिकारक है तो उसे गटर में ही फेंकना पड़ेगा न । ऐसे में उसकी कीमत दो कौड़ी की हुई न !

वेबू - हाँ, आपकी बात दो रुपए के फटे नोट जैसी सच है मगर उसे दो कौड़ी की मान लें तो अखबार में फोटो के साथ खबर कैसे बनेगी?

काका - और क्या लिखा है?
वेबू - एक यात्री ने संपादक के नाम पत्र में क्षोभ जताया है । प्रदेश की परिवहन निगम की बस में लिखा है कि हमारी सभ्यता आपके व्यवहार पर निर्भर है। जो ठीक नहीं लगता ।

काका - ठीक ही तो है । कंडक्टर ही तो यात्रियों के बैड कंडक्टर का ख्याल रखेगा । वैसे यदि निगम अपनी बसों में परिचालकों के स्थान पर विमान सेवाओं जैसी परिचालिकाएँ नियुक्त कर दे तो लोगों का व्यवहार भी ठीक हो जाएगा और कमाई का ग्राफ भी विमान सरीखा ऊपर चला जाएगा।

वेबू - आजकल अखबारों के पन्नों पर विदेशी ललनाओं के रोज चित्र छापे जा रहे हैं।

काका - हाँ मैंने भी देखा है। इनके नाम याद रखना एक नई कसरत हो गई है। पर अब यदि विश्व को पहचानना है तो करनी ही पड़ेगी।

वेबू - फिर भारतीय सुंदरियों का क्या होगा ! उनके चित्र छपेंगे या नहीं?

काका - छपेंगे जरूर छपेंगे । वे पहले एक्सपोर्ट होंगी। फिर विदेशी लेबल (ताज पहनकर) वापस आएँगी तो अवश्य छपेंगी। हा हा हा हा
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WD