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उर्दू साहित्य
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
सोमवार,फ़रवरी 2, 2009
तर दामनी पे शेख हमारी न जइयो
कमसिनी का हुस्न था वो, ये जवानी की बहार
फ़रिश्ते वक़्त से पहले अज़ाब देने लगे
रोशनी बाँट ली उभरे हुए मीनारों ने
गंजीनाए माअनी का तिलिस्म उसको समझये
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
वाजिब है मालदार को देना ज़कात का
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
तुझे न माने कोई इससे तुझको क्या मजरूह
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
या रब न वो समझे हैं न समझेंगे मेरी बात
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
9
रोक सकता हमें ज़िन्दान-ए-बाला क्या मजरूह
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
फूल की पत्ती से कट सकता है हीरे का जिगर
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
तुम हो क्या, ये तुम्हें मालूम नहीं है शायद
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
देश की ख़ातिर मिटादे अपनी हस्ती तू नदीम
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
उस आफ़ताबे शहर को उर्दू ज़ुबान में
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
मुझी को नाज़ से देखा जला जो परवाना
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
दी मुअ़ज्ज़न ने अज़ां वस्ल की शब पिछले पहर
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
मुत्तसिल रोने से शायद कि बुझे आतिशे दिल
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
17
ख़्याल-ए-वस्ल को अब आरज़ू झूला झुलाती है
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
मेरा दिल हर ज़ाविए से हर नज़र से देखिए
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
मसाइब और थे पर दिल का जाना
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
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