यात्रा संस्मरण : मेरी दक्षिण की यात्रा

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बीस किलोमीटर पर मटुपट्टी डैम था। यहां लोग हाथी की सवारी भी करते हैं। एक नवविवाहित जोड़ा हाथी पर बैठा था और महावत हाथी को लेकर चल रहा था, पर लग नहीं रहा था कि उन्हें कोई आनन्द आ रहा है। चेहरे पर स्पष्ट था कि वे मात्र एडवेंचर के लिए ही बैठे हैं। ईको पाइंट पर बच्चे और बड़े पूरे जोर से चिल्ला रहे थे, लेकिन प्रतिध्वनियां उतनी तीखी नहीं थी। कुंदाला झील में फिर बोटिंग की। छोटी सी नौका, झील में दूर दूर तक जा रही थी। 
अन्नाईमुड़ी पीक की ओर हम सरकारी बस से पहुंचे। आगे की आठ किलोमीटर की चढ़ाई स्वयं चढ़नी थी, उसके बाद वर्जित क्षेत्र था। कहा गया कि आगे खूंखार जंगली जानवर हैं। चढ़ाई चढ़ते समय कोई मकसद लग रहा था, लेकिन उतराई पर मन एकदम शांत था। मानों कोई रिटायर्ड व्यक्ति शांत मन से जीवन संध्या के धुंधलके में स्थिर मन कदम-कदम चल रहा हो।
 
दर्शनीय स्थलों को देखते-देखते अगले दिन हम थैकरे पहुंचे। होटल 'सिल्वर क्रैस्ट' पेरियार की वाइल्ड लाइफ सैंचुरी से, मात्र तीन-चार किलोमीटर दूर और समुद्र तट से 2800 फुट ऊॅंचा था। यहां का मुख्य आकर्षण वाइल्ड लाईफ ही था। झील पर पहुंचते ही, लहरों के मूक-आमंत्रण आकर्षित करने लगते हैं - 'तीर पर कैसे रुकूं मैं, आज लहरों में निमंत्रण।' नौका नहीं, यहां नौकाएं चल रही थी और दूर जंगलों में हर यात्री की आंखें अटकी पड़ी थी। कुछ खास तो नहीं, पर कहीं कहीं कुछ हाथी, जंगली सूअर और तरह तरह के हिरण अवश्य देखने को मिले।
 
अलापूज्हा के शानदार होटल 'आरकेडिया रीजेंसी' के आगे गाड़ी खड़ी हुई। उन्हें हमारी प्रतीक्षा थी। जैसे ही नाम एन्टर हुआ, दो बैरे सामान उठाने आए। वेलकम ड्रिंक दिया गया। बड़ी चमचमाती लॉबी थी। मेज पर पड़ी इंडियन एक्सप्रेस और हिंदुस्तान टाईम्स बरबस आकर्षित कर रही थी। होटल शहर के अंदर स्थित था। छत पर स्विमिंग पूल था। अलापूज्हा के बैक वाटरज में हाउस बोट्स की भीड़ थी। गहरे हरे रंग का पानी और उसमें उगे घने पौधे। खूब सजी-धजी नौकाएं/ शिकारे, रंगीन फर्श, रंगीन छत, रंगीन पर्दे, कायदे की खिड़कियां। प्रत्येक नौका में मात्रा एक जोड़ा ही था। इस पूरी दक्षिण यात्रा में हमें हनीमून के जोड़े बहुत कम दिखे। छड़ी की टेक लिए बतियाती, खिलखिलाती, खूबसूरत, चुस्त और फिगरेटिव, साथी के साथ धीरे-धीरे मुस्काती स्त्रियां। विदेशी स्त्रियां हाथ में नोट-बुक लिए सर्वत्र कुछ न कुछ लिखती ही दिखाई दी। एक जगह तो मैंने पूछ ही लिया कि कोई प्रोजेक्ट है या वैसे ही...? उसका उत्तर था- स्मृतियों की सुरक्षा और उनका क्रम बनाए रखने के लिए। बच्चों के साथ युवा विदेशी जोड़े भी कहीं-कहीं दिख रहे थे। केरल स्टेट में सब लोग दुबले पतले और छरहरे थे। मानों यहां के लोगों को यह दैवी वरदान मिला हो, पर चेहरे पर भी वह तेज कम ही देखने को मिला, जिससे मोटे लोग जगमगाते रहते हैं। एक स्थल पर शिकारा किनारे से लगा। मांझी हमें घरनुमा दुकान में ले गया। वहां नारियल या ठंडी कोक भी उपलब्ध थी। ड्राइवर ने बताया कि अलापूज्हा का अर्थ ही बैक वाटरज है। 
 
पेट्रोल पम्प पर युवतियों को पेट्रोल भरते देखना बड़ा अच्छा लगा, क्योंकि पंजाब में अभी यह चलन नहीं है। अलपूज्हा के होटल में सुनहरी किनारी की क्रीम साड़ी, लाल ब्लाउज पहने शालीन वेटर युवती को देख यही ध्यान आया, कि इसकी अगली मंजिल एयर होस्टेस बनना ही होगी। बाजारों में कहीं भीड़ नहीं थी, लेकिन ऐसे में भी केमिस्ट या ऐसी ही दूसरी दुकानों पर सिर्फ महिलाओं को देखना सुखद लगा।
 
केबल टी.वी. ,ए.सी. ,आयुर्वेदिक मसाज, चौबीस घंटे की कॉफी शॉप, चौबीस घंटे की रूम सर्विस, खुले लॉन की सर्विस, आउटडोर स्विमिंग पूल, चैस, कार्ड्स, कैरम जैसी इनडोर गेम्स की सुविधा, लॉकर सुविधा, चिकित्सा सुविधा, ड्राइवरों के लिए डोरमेंट्री, उनके नाश्ते और रात के खाने का इंतजाम- लगभग हर होटल में था। बेलों-फूलों से खिले उपवन, उजली चमचमाती शानदार लॉबी, जायकेदार वेलकम ड्रिंक हर बार नए सिरे से आकर्षित कर रहे थे। सब कुछ अत्याधुनिक, आकर्षक और आरामदेह था।
 
हर दुकान, होटल, बैंक आदि का बोर्ड मलयालम में ही था। आश्चर्य, कि देश की इस स्टेट में राष्ट्र भाषा का नाम तक नहीं। जरा सी बात के लिए कभी हिन्दी, कभी अंग्रेजी का आश्रय लेना हमारी मजबूरी थी। हवाई अड्डे पर अगर राष्ट्र भाषा में कुछ लिखा था, तो उसमें वर्तनी की ढेरों अशुद्धियां थी। यहां तक कि 'कन्याकुमारी' यहां 'कन्याकुमारि' हो गया था।यहां के विशाल परिसरों वाले मंदिर अपनी तरह के ही थे। हेरिटेज की दृष्टि से उनका महत्व ज्यादा लग रहा था। पुरुषों के लिए मंदिर में धोती पहन कर जाना अनिवार्य था, और कहीं कहीं स्त्रियों के लिए भी यह नियम था। सब पवित्र, शुभ, लोकोत्तर था। तेल चढ़ाने की प्रथा भी देखी। शायद तेल के कारण ही बहुत कुछ चिपचिपाता और धुंआता सा लग रहा था। 



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