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Last Modified: सोमवार, 2 मार्च 2026 (15:16 IST)

'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' में गुड टच–बैड टच जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अमर उपाध्याय बोले- चुप्पी नहीं, बच्चों की हिफाजत पहले

Kyunki Saas Bhi Kabhi Bahu Thi latest episode
स्टार प्लस को रोज़ाना के ड्रामा और मनोरंजन से हटकर कहानियाँ सुनाने के लिए जाना जाता है। इसके शोज ने अक्सर उन असली भावनाओं, संघर्षों और बातचीत को दिखाया है जो भारतीय घरों के अंदर होती हैं। इनमें से, 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' सबसे यादगार शोज़ में से एक रहा है। 
 
यह सिर्फ एक फैमिली शो से कहीं बढ़कर था, इसने उन किरदारों के जरिए जरूरी चर्चाओं के लिए जगह बनाई जो दर्शकों को अपने परिवार का हिस्सा लगते थे। हाल ही के ट्रैक में, शो ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि यह आज भी क्यों इतना मायने रखता है। 
परी की बेटी गरिमा के किडनैपिंग के डरावने हादसे के बाद, एक बहुत ही भावुक पल दिखाया गया है जहां तुलसी, गरिमा के साथ बैठकर उससे उस बारे में बात करती है जिसे आज भी कई परिवार छेड़ने में हिचकिचाते हैं: 'गुड टच' और 'बैड टच' के बीच का फर्क। तुलसी, गरिमा को भरोसा दिलाती है कि आवाज उठाना हमेशा सही होता है और किसी भी बच्चे को अपनी बात कहने में डरना या शर्मिंदा नहीं होना चाहिए।
 
इस जरूरी ट्रैक के बारे में बात करते हुए अमर उपाध्याय ने कहा कि भले ही ऐसी बातें करने में झिझक महसूस हो, पर ये बेहद जरूरी हैं। उन्होंने बताया कि इन चर्चाओं को सामान्य बनाने से जागरूकता आती है और बच्चों के लिए एक सुरक्षित माहौल बनता है।
 
अमर उपाध्याय ने साझा किया, एक ऐसे शो से जुड़े होने के नाते जो लाखों घरों तक पहुँचता है, मुझे लगता है कि मनोरंजन से आगे बढ़ना हमारी ज़िम्मेदारी है। गुड टच और बैड टच के बारे में बात करना सिर्फ एक कहानी नहीं है, यह एक ज़रूरी चर्चा है। इस विषय को लेकर हिचकिचाहट असली है, लेकिन हमारे बच्चों की सुरक्षा हमारी झिझक से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है।
 
​टेलीविजन पर ऐसे संवेदनशील मुद्दों को उठाने की अहमियत पर उन्होंने कहा, बच्चों को यह फर्क सिखाना उन्हें जागरूकता, आत्मविश्वास और अपनी बात कहने की हिम्मत देता है। उन्हें यह जानने की ज़रूरत है कि उनकी आवाज़ मायने रखती है और उन्हें सुना जाएगा। अगर इससे एक भी परिवार अपने घर में यह बातचीत शुरू करने के लिए प्रेरित होता है, तो हमने अपने बच्चों के लिए एक सुरक्षित माहौल बनाने की दिशा में एक सार्थक कदम उठाया है।
 
हर दिन लाखों लोग 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' देखते हैं, और ऐसे पल महज़ ड्रामे से कहीं बढ़कर होते हैं। यह शो घरों के अंदर असली बातचीत शुरू कर रहा है, जिससे माता-पिता और बच्चों को खुलकर बात करने की प्रेरणा मिल रही है। सहमति और सुरक्षा जैसे मुद्दों को संवेदनशीलता से दिखाकर, इसने साबित कर दिया है कि टेलीविजन लोगों की सोच बदल सकता है और सार्थक बदलाव ला सकता है।
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