घर...जहाँ प्यार ही प्यार बसे
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भारती पंडित '
चलो बच्चों! रात हो रही है। घर नहीं जाना है क्या?' बेटे के साथ खेल रहे उसके दोस्तों को मैंने आवाज दी। मेरा बेटा नौवीं कक्षा में है और अक्सर उसके दोस्तों का जमावड़ा हमारे घर लगा रहता है। 'आंटी, थोड़ी देर और...वैसे भी घर जाकर करना क्या है' मोहित भुनभुनाया था। मैंने मोहित का सिर सहलाकर पूछा, 'क्यों, क्या बात है, बेटा...'। 'कुछ नहीं आंटी-घर में तो पापा के ऑफिस वालों का जमावड़ा रहता है। बस, अपने कमरे में दुबके बैठे रहो न सीडी सुन सकते हैं, न टीवी की आवाज बढ़ा सकते हैं, न जोर से हँस सकते हैं।' स्मृति के घर सुबह दस बजे से शाम छः बजे तक सब नॉर्मल रहता है। छः का घंटा बजते ही मानो सारा घर खामोशी की चादर ओढ़ लेता है। वह समय होता है, स्मृति के पति के घर आने का...वे जैसे घर के हिटलर हैं- आते ही घर का सूक्ष्म निरीक्षण करते हैं कि किस कोनेको लेकर मीन-मेख निकाला जा सकता है। उनके आते ही अब तक खिलखिलाते बच्चे कोने में जा किताबों में सिर छुपा लेते हैं। बच्चों का हँसना, जोर से बात करना, टीवी शो देखना, फोन पर बात करना उन्हें सख्त नापसंद है। बस उनके आदेशों का तत्परता से पालन होता रहे, तो घर में शांति, अन्यथा जरा-सी अव्यवस्था पर भूचाल आते देर नहीं लगती। दीपा की सासूमाँ तो और भी निराली हैं। उनके स्वभाव के कारण दीपा के परिचितों ने भी घर में आना-जाना छोड़ दिया है। वे दिनभर सफाई और पूजा-पाठ करती हैं। आने वालों को केवल ड्राइंग रूम में बैठने की इजाजत है। गलती से घर में जूते आ गए तो सारे घर की शुद्धि होती है। रसोई में घुसने से पहले हर सदस्य को नहाना पड़ता है। चाहे वह दिन में तीन-चार बार क्यों न हो... दीपा ने तो समझौता कर लिया था, पर बच्चे विद्रोह पर उतारू हो जाते हैं और घर आए दिन कुरुक्षेत्र का मैदान बन जाता है। घर का ख्याल दिमाग में आते ही जहाँ हमारे सुरक्षित, शांतिदायक स्थान का चित्र उभरता है। जहाँ हमारे अपने होते हैं। उनके साथ हम दिनभर की थकान के बाद चैन के, शांत के कुछ पल बिताते हैं, हँसते हैं, खिलखिलाते हैं। घर केवल चार दीवारों से नहीं बनता, बाहरी-भीतरी चमक-दमक उसे केवल मकान का रूप देती है। घर तो बनता है-उसमें रहने वालों की भावनाओं से, स्नेह से, अपनेपन से...और इसके लिए जरूरी है आपसी सामंजस्य, एक-दूसरे की भावनाओं का आदर और बहुत सारी समझदारी।
मेरी एक सहेली के बेटे ने तो जानबूझकर हॉस्टल में रहने का विकल्प चुना क्योंकि वह घर में खुश नहीं था। क्या आपको या आपके घर के सदस्यों को भी घर से बाहर रहने की इच्छा होती है? क्या घर जाने के नाम से ही आपको घबराहट होती है? क्या घर में आपके लिए ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ आप कुछ पल अपने लिए बिता सकें? यदि हाँ, तो अभी भी समय है... बाँध ले घर की ढहती दीवारों को- घर को घर जैसा बनाएँ। बहुमूल्य सजावटी सामान की सुरक्षा करते-करते कहीं सदस्यों की स्वतंत्रता ही न छिन जाए, इसका ध्यान रखें। दफ्तर-व्यापार की कितनी ही परेशानियाँ हों, उन्हें घर तक न लाएँ। घर लौटें, ताजगी भरी मुस्कान और प्यार-बेकरारी के साथ। घर में ऑफिस न लगाएँ। घर की साफ-सफाई जरूरी है पर इसे सनक न बना लें। कभी-कभी बेतरतीबी को भी पाँव पसारने दें। विशेषतः बच्चों के सिर पर हर वक्त सफाई का डंडा न घुमाएँ। उन्हें बस उनकी जिम्मेदारियों से अवगत करा दें, आपका काम यूँ ही हो जाएगा। आपसी बातचीत में एक-दूसरे के सम्मान का, भावनाओं का ध्यान रखें। सदस्यों के बीच स्वस्थ संवाद का मार्ग खुला रखें। दिनभर में कोई समय तो ऐसा रखें ही, जब सारे सदस्य एक साथ हों। घर में आए दिन पार्टियों के आयोजन से बचें। छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करने की आदत डालें- मसलन गीला तौलिया बिस्तर पर क्यों, शीशा जगह पर क्यों नहीं, गिलास धुला क्यों नहीं, किताबें डाइनिंग टेबल पर क्यों..., इन बातों पर विवाद करने की बजाय कोई और कारगर तरीका अपनाएँ। बड़े होते बच्चों पर नजर तो रखें, पर हर वक्त टोका-टोकी, टीका-टिप्पणी से बचें। उनकी उम्र की आवश्यकताओं को समझें। अपने निरीक्षण में थोड़ी-सी स्वतंत्रता देकर उन्हें पंख फैलाने का मौका दें। उनके दोस्तों के साथ सुसंवाद रखें, उनसे स्नेह जताएँ। इससे आप बच्चों पर नजर तो रख ही पाएँगे, साथ ही स्नेह-विश्वास की डोर भी मजबूत होती जाएगी। धन्यवाद, माफ करना, सुंदर है आदि चमत्कारी शब्द केवल बाहर नहीं घर में भी उपयोग करना जरूरी है। हमेशा एक आलोचक की भूमिका न निभाएँ। प्रशंसा करें, सम्मान दें और उत्साहवर्धन करना सीखें। '
मेरा घर है, मेरा रुपया है, मैं जैसा चाहूँगा/चाहूँगी वैसा ही होगा' इन बातों को तुरंत डिक्शनरी से निकाल फेंकें, अन्यथा ये घर के स्नेह को दीमक की तरह चाट जाएँगे और फिर घर की दीवारों में सिर्फ पत्थर ही रह जाएँगे। वास्तव में व्यक्ति के स्वस्थ विकास हेतु उसके आसपास का वातावरण अर्थात घर भी उत्तरदायी होता है। स्वस्थ माहौल में पले बच्चे बड़े होकर स्वस्थ मानसिकता को धारण करते हैं और जिम्मेदार व्यक्ति बनते हैं, अतः आइए अपने ही घर का निरीक्षण करें और घर को घर बना लें।