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Written By ND

आओ बातें करें...

संवाद रिश्तों अवसाद ठंडक
- श्याम माहेश्वर

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बिना संवाद रिश्तों में ठंडक आ जाना आम बात है। यही ठंडक जन्म देती है अवसाद और तनाव जैसी परेशानियों को। जरूरी है कि घर के सभी सदस्य एक स्वस्थ माहौल में कुछ देर एक-दूसरे से बातें बाँट लें, ताकि रिश्तों के टुकड़ों में बँटने की नौबत न आए।

आज समाज के लगभग हर परिवार के सदस्यों में तनाव देखने को मिलता है। बेटा बाप से, बेटी माँ से, पत्नी पति से, तो भाई बहन से रूठे नजर आते हैं।

इन सभी समस्याओं का मूल कारण है कि किसी को दो घड़ी पास बैठाकर बातचीत करने या अपना विचार बताना की फुर्सत ही नहीं है। सभी टीवी या अपने कमरे तक सीमित होते जा रहे हैं। परिवारों में संवादहीनता पसरी हुई है जिसके कारण हम एक-दूसरे से भावनात्मक रूप सेनहीं जुड़ पा रहे हैं। माता-पिता और बच्चों के बीच एक शून्य उत्पन्न होता जा रहा है। माता-पिता बच्चों से अनावश्यक बातचीत नहीं करना चाहते, सिर्फ जरूरी बातें पूछकर ही रह जाते हैं। जबकि माता-पिता को बच्चे की प्रत्येक बात जानना आवश्यक है। इसका मतलब हर समय उस परहावी रहना नहीं बल्कि स्वस्थ संवाद बनाए रखना है। स्वयं पूछने से बच्चा धीरे-धीरे आपसे खुलेगा और फिर स्वतः ही हर बात बताना उसकी आदत में शामिल हो जाएगा। किशोर होते बच्चों के लिए तो यह और भी आवश्यक है। वे कहाँ जा रहे हैं? क्या पहन रहे हैं? उनके कौन से दोस्त हैं? क्या रुचियाँ हैं? वे प्रतिदिन क्या कर रहे हैं- यह जानना आपके लिए बहुत जरूरी है। माता-पिता के लिए यह भी जरूरी है कि वे अपनी हर जायज बात को बच्चों को बताने का प्रयास करें। यदि आप गृहिणी हैं तो आपने आज दिन में क्या काम किया, कौन आया आदि पर चर्चा करें। यदि आप नौकरीपेशा हैं तो अपने कार्यस्थल की छोटे-छोटी बातें बताएँ।

कई बार ऐसा देखने में आता है कि पति-पत्नी आपस में ही एक-दूसरे को नहीं जानते। क्योंकि वे आपस में एक-दूसरे से चर्चा ही नहीं करते या कम करते हैं। पति-पत्नी का संबंध बस खाना खा लो, कपड़े धो लो तक ही सीमित रहता है। ऐसे में संबंधों में दूरी बढ़ना तो स्वाभाविक ही है। हमारे एक मित्र का कहना है कि हमारी कोशिश रहती है कि जिस कमरे में पिताजी बैठे हों उस कमरे में हम न बैठें। यह स्थिति आज वृद्धों को परेशान करती है। इसलिए वृद्धावस्था में उन्हें शिकायत रहती है कि बच्चे माता-पिता के पास नहीं बैठते।

याद रखें संवादहीनता से वैचारिक मतभेद बढ़ते हैं जो अंततः भावनात्मक दूरी में बदल जाते हैं। माता-पिता और बच्चों के बीच यदि आरंभ से संवादहीनता की स्थिति पैदा नहीं हो तो अंत तक वैचारिक आदान-प्रदान रहेगा और 'जनरेशन गेप' जैसी समस्या से काफी हद तक निजात पाई जा सकेगी। साथ ही नई पीढ़ी में पनप रही अवसाद, तनाव व कुंठा जैसी परेशानियों का हल भी मिल जाएगा।
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