तुम्हारा एक चुटकी प्यार दब रहा है एक मुट्ठी गुस्से के नीचे तुम्हारी एक पल की झलक धुंधला रही है एक युग की जुदाई के पीछे तुम्हारा वह रत्ती भर का साथ रूला रहा है मुझे मन भर के परायेपन के साथ बस नहीं मिट सकी तुम्हारी एक मीठी-सी बात लंबे-लंबे कड़वे संवाद के बाद।
सब टूट रहा है, भूल रहा है और लरज रहा है बस नहीं बिखरा है, नहीं बिसरा है आज भी तुम्हारी याद का वह पहला मानसून जो मन की भीगी क्यारियों में तब से लेकर आज तक बरस रहा है।
समय के साथ सब पकता गया और छुटता गया साथ,
लेकिन, है आज भी मेरे भीतर उतना ही कच्चा, उतना ही सच्चा, वह कुवांरा अहसास।