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श्री सत्यनारायण कथा
काका - वेबू से फोन मिलाकर बात करते हुए। भई वेबू आज शाम तुम्हें सपरिवार मेरे यहां आयोजित सत्यनारायण कथा तथा उसके बाद आयोजित प्रीतिभोज में भाग लेना है। वेबू - रुको-रुको काका। आपने तो बिगड़ती कानून व्यवस्था की तरह कई प्रश्नों से मुझे मुखातिब कर दिया। आगे आपने कुछ और कहा तो मैं कश्मीर समस्या पर राजग सरकार की तरह उलझ जाऊंगा। पहला प्रश्न यह है कि मेरा स्वयं का तो कोई परिवार नहीं है। मैं अभी तक कुंआरा हूं। तो सपरिवार से आपका क्या तात्पर्य है। मैं अकेला आमंत्रित हूं या माता, पिता, भाई, बहन सहित। काका - देख भई वेबू अपन ठहरे गरीब लेखक आदमी। टेलीफोन पर लंबी वार्ता करने को तैयार हैं पर इसका बिल नहीं भर सकेंगे। वेबू - फोन काट कर स्वयं लगाते हुए अब ठीक रहा ना। पापा का फोन तो सरकारी है अब हमें फर्क नहीं पड़ता। काका - मेरे हिसाब से यह गलत तो है, पर ठीक है। क्या करूं रोज जब तक तुमसे वार्ता नहीं हो जाती मन ही नहीं लगता है। कुछ लिख ही नहीं पाता। वेबू तुम्हें माता-पिता, भाई-बहन सहित आना है। परिवार आजकल युवा बच्चों का होता है उनके माता-पिता का नहीं। अब देखो हर घर में पिताजी तो सिर्फ कमाने की मशीन होते हैं और माताजी घर की व्यवस्थापक मैनेजर। सबसे अच्छा खाते हैं बच्चे, शानदार महंगे जूते, कपड़े पहनते हैं बच्चे। टीवी, सिनेमा पार्टी पिकनिक का मजा लेते हैं बच्चे। बाइक पर घूमते हैं बच्चे। जितना पिताजी के पिताजी की कमाई नहीं थी उतना जेब खर्च पाते हैं बच्चे।
साथ ही घर के सब कामकाज भी बच्चों की रुचि, सलाह व निर्णयों के आधार पर होते हैं। कुछ ही मामलों में माता-पिता के पास वीटो का अधिकार रह गया है। अब तुम्हीं बताओ परिवार माता-पिता का हुआ या बच्चों का। वेबू - काका जसपाल भट्टी को पढ़-पढ़कर आप भी उलटा-पुलटा करने में माहिर हो गए हो। अब दूसरी बात यह कि सत्यनारायण की कथा की आपको कैसे सूझ गई। आजकल तो इस कथा का चलन ही नहीं है। टीवी के अलग-अलग चैनलों पर इतनी कथाएं परोसी जा रही हैं कि प्राइम टाइम तो क्या कोई सा भी टाइम कथा सुनने के लिए खाली नहीं है। काका - भई लेखकीय धर्म का एक तकाजा यह भी है कि अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं को बनाए रखने की हम न सिर्फ बात करें, बल्कि कुछ करके भी दिखाएं। दूसरा गरीब लेखक वर्ग की आशाएं आज भी देश की सरकार के बजाय सत्यनारायणजी की सरकार पर ही टिकी हुई हैं। आज भी सत्यनारायणजी को जो भेंट-पूजा-चढ़ावा लगता है वह सरकारी पूजा से कम है और उसकी विधि तथा समय भी निश्चित और सरल है और भगवान से फल प्राप्ति की संभावना का ग्राफ ज्यादा आशाजनक है। वेबू - चलिए कथा का मान लिया, मगर उसके साथ यह प्रीतिभोज आज तक कभी नहीं सुना। ये क्या सूझी आपको। मुझसे सलाह तो ले लेते। काका - अरे प्रीतिभोज के निमंत्रण के बगैर आज का आदमी घर से बाहर निकलता है क्या? वह समय लद गया जबकि सिर्फ अंजुलि भर प्रसाद पाने के लिए लोग आरती के टाइम पर एकत्र हो जाया करते थे। वेबू - मगर प्रीतिभोज का खर्च। काका - अरे बाबा तुम्हारे छोटे भाई पप्पू का जन्मदिन भी तो है आज। कई वर्षों से मनाने के लिए तंग कर रहा था। अन्य खर्चों में कटौती करके किसी तरह इस वर्ष बजट बनाना ही पड़ा। आखिर मुझे भी अपने बच्चों के परिवार में रहना है।