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ताकि माटी साँस ले सके...

गुरुवार,अक्टूबर 7, 2010
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1970 के बाद से पूरे इलाकों में भूस्खलन की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई, भूकम्प की घटनाएँ हुईं, तब लोगों को समझ आया कि इन प्राकृतिक आपदाओं का वन कटाई से कितना गहरा रिश्ता है। वनों की बेलगाम कटाई से पूरी आबादी का अस्तित्व कैसे संकट में पड़ सकता है, यह ...
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सौर मंडल के ग्रह पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों की वजह से कई तरह के खतरे मंडरा रहे हैं और विशेषज्ञों का कहना है कि आए दिन तूफान, चक्रवात, बारिश, सूखा, कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में वृद्धि और जानलेवा बीमारियाँ.. यह संकेत हैं कि मानव को ...
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एक आवाज पर्यावरण के लिए

शुक्रवार,जून 4, 2010
हमारे पूर्वजों ने वृक्ष लगाए होंगे तभी आज हमारे आसपास दिखाई दे रहे हैं और हमें छाया प्रदान कर रहे हैं। दोस्तो लगभग 20 वर्ष पहले तक हमारे घर के कमरों में आकर एक छोटी सी चिड़िया फुदका करती थी। आज वह मुझे शहर से लगभग 15-20 किलोमीटर दूर ग्रामीण ...
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.... और जिस दिन नर्म मुलायम पत्ती ने शरमाकर हल्का-सा सिर ऊँचा किया - आत्मा के सुप्त तारों में एक साथ कई रागिनियाँ बज उठीं रोम-रोम छनन...छुम थिरक उठा। यह है सृजन सुख।
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जर्मन मौसम विभाग (डीडब्ल्यूडी) द्वारा इस साल का अप्रैल महीना 1820 से अब तक का सबसे गर्म अप्रैल माह दर्ज किया गया है। डीडब्ल्यूडी ने यह भी रिपोर्ट की है कि बीते साल की गर्मियाँ अपेक्षाकृत गरम रही हैं और तापमान औसतन 8.3 के बजाय 9.2 डिग्री सेल्सियस तक ...
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यह तो आप जानते ही होंगे कि दुनिया की सबसे ऊँची पर्वत श्रृंखला हिमालय का निर्माण महाद्वीपों की टक्कर से हुआ था, पर आपको शायद ही मालूम हो कि महाद्वीपों की इसी टक्कर ने भारत को धरती के ‘मैंटल’ में 200 किलोमीटर गहराई में धकेल दिया था।
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गुलमोहर

गुरुवार,जून 3, 2010
मुझ को खुशी मिली, तेरे जीवन से गुलमोहर, तू मेरे दिल के साथ है बचपन से गुलमोहर, रग़बत दर-ओ-दीवार से मुझ को नहीं ज़रा, मैं तो बंधा हूँ बस तेरे बंधन से गुलमोहर, सीखा है मैंने तुझ से लुटाना मसर्रतें, तुझ से है पक्की दोस्ती, बचपन से गुलमोहर..
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भूविज्ञान मंत्रालय (मिनिस्टरी ऑफ अर्थ साइंस) ने ग्लोबल वॉर्मिंग के भारत पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का भयावह चित्रण किया है। मंत्रालय की कुछ समय पहले जारी रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते भारत में समुद्र का स्तर बढ़ने से उसके ...
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ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते विश्वभर में हो रहे जलवायु परिवर्तन के कारण प्रकृति का संतुलन बिगड़ने लगा है। अगर कुछ वैज्ञानिकों की मानें तो यह ग्लोबल वॉर्मिंग एक प्रकृतिजन्य प्रक्रिया का हिस्सा है, जो एक निश्चित समय चक्र पर लगातार होती है।
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ग्लोबल वॉर्मिंग पर लगातार होती बहस के बीच कुछ लोगों का मानना है कि इससे नुकसान की बजाय फायदे भी होंगे। उनकी नजर में यह एक प्राकृतिक घटना है और इसे रोका नहीं जाना चाहिए। इस सिद्धांत को 'ग्लोबल वॉर्मिंग स्केप्टिक्स' कहा जा रहा है।
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जल, जंगल और जमीन, इन तीन तत्वों के बिना प्रकृति अधूरी है। विश्व में सबसे समृद्ध देश वही हुए हैं, जहाँ यह तीनों तत्व प्रचुर मात्रा में हों। हमारा देश जंगल, वन्य जीवों के लिए प्रसिद्ध है। सम्पूर्ण विश्व में बड़े ही विचित्र तथा आकर्षक वन्य जीव पाए जाते ...
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सुबह देखना हो तो बनारस की देखो, शाम देखना हो तो अवध की देखो, लेकिन शब अर्थात रात देखना हो तो मालवा की देखो। परंतु विकास के नाम पर अब सब कुछ मटियामेट कर दिया गया है। मालवा के धार, झाबुआ, रतलाम, देवास, इंदौर, उज्जैन, मंदसौर, सीहोर, शाजापुर, रायसेन, ...
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गौरैया, तुम कहाँ हो....!

गुरुवार,जून 3, 2010
हमारा बचपन सुबह-सुबह धूप में इधर-उधर फुदकती, चहकती एक छोटी से सुन्दर चिड़िया को देखते बीता है। कुछ साल पहले अमूमन हर घर-आँगन में दिखाई पड़ने वाली अपनी सी घरेलू गौरैया, अब ढूँढ़े से भी नहीं दिखती। पर्यावरण को होने वाली मानवजन्य क्षति की एक और मिसाल बनने ...
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बिगड़ते पर्यावरण से अस्त-व्यस्त होते पारिस्थितिकी तंत्र से आने वाले सालों में भीषण परिणाम देखने को मिलेंगे। विश्व की वन्य प्रजातियों के संरक्षण के लिए काम करने वाली स्विट्जरलैंड के एक संस्था इंटरनेशनल यूनियन फॉर द कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IEUSN) ने वन्य ...
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