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शुक्र स्तम्भन क्या है ?
प्रश्न : वीर्य शरीर में कहाँ रहता है ?

उत्तर : वीर्य शरीर में किसी विशेष जगह पर नहीं रहता, बल्कि जब पुरुष को कामोत्तेजना होती है, तब तीन ग्रंथियों से स्राव निकलना शुरू होता है और शुक्राशय में यह स्राव इकट्ठा होने लगता है। इस मिश्रण को वीर्य कहते हैं। इन ग्रंथियों के नाम हैं- 1. पौरुष ग्रंथि 2. मूत्र प्रसेकीय ग्रंथि और 3. स्वयं।

शरीर में वीर्य किसी विशेष स्थान पर नहीं रहता, बल्कि जैसे दूध में घी और गन्ने में रस सर्वत्र व्याप्त रहता है, वैसे ही शुक्र (वीर्य), शुक्रधरा कला के रूप में सारे शरीर में व्याप्त रहता है। जब पुरुष कामुक विचार और क्रीड़ा करता है, तब यौनांग जाग्रत और उत्थित होता है और तब शुक्र (वीर्य) अपने स्थान (शुक्राशय) से चलकर शुक्र स्खलन नलिका से होता हुआ शिश्न से बाहर निकल जाता है। जब तक कामुक विचार और कामुक क्रीड़ा नहीं की जाती, तब तक वीर्य का स्राव नहीं होता और शुक्राशय खाली पड़ा रहता है। यही सिद्धांत पश्चिमी शरीर विज्ञान भी प्रतिपादित करता है।

प्रश्न : शुक्र स्तम्भन क्या होता है और कैसे होता है ?

उत्तर : यौन क्रीड़ा करते समय बहुत देर तक वीर्यपात न होने को शुक्र स्तम्भन कहते हैं। यह स्थिति शीघ्रपतन के बिल्कुल विपरीत है, क्योंकि सहवास (यौन क्रीड़ा) शुरू करते ही या करने से पहले या कामुक विचार करने मात्र से वीर्य स्खलित हो जाने को शीघ्रपतन कहते हैं। शुक्र स्तम्भन दो तरह से होता है, जो पुरुष बचपन से ही चरित्रवान रहते हैं, यौन क्रीड़ा करना तो दूर, उसका विचार तक नहीं करते, अच्छा पौष्टिक आहार-विहार करते हैं, व्यायाम या खेल-कूद करके जिन्होंने अपने शरीर को बलवान बनाया है, उन युवकों को प्राकृतिक रूप से ही शुक्र स्तम्भन होता है।

दूसरा उपाय आयुर्वेद के श्रेष्ठ वाजीकरण योग और स्तम्भनकारी द्रव्यों का सेवन करना जैसे वीर्यस्तम्भन वटी नामक योग और जायफल, जावित्री, बड़ का दूध, भांग, केसर या खसखस आदि द्रव्य स्तम्भन करते हैं। इस दूसरे उपाय की अपेक्षा पहला प्राकृतिक उपाय अच्छा भी है और टिकाऊ भी।

प्रश्न : बांझपन का जिम्मेदार कौन होता है, पत्नी या पति ?

उत्तर : दोनों में से कोई भी जिम्मेदार हो सकता है। पत्नी के गर्भाशय में कोई विकृति हो, फेलोपियन ट्यूब बंद हो, अंदर कोई सिस्ट या ट्यूमर हो, ओवूलेशन न होता हो आदि कारणों से स्त्री बांझ हो जाती है। यदि पुरुष के वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या आवश्यकता से कम हो, जिसे ओलिगोस्पर्मिया कहते हैं या शुक्राणु कतई न हों, जिसे अजोस्पर्मिया कहते हैं तो ऐसा पुरुष गर्भ स्थापित नहीं कर सकता, इसीलिए वह भी बांझ होता है। इस तरह बांझपन के लिए सिर्फ स्त्री ही नहीं, पुरुष भी जिम्मेदार होता है।

प्रश्न : क्या गर्भकाल के दौरान सहवास किया जा सकता है ?

उत्तर : किया तो जा सकता है पर करना नहीं चाहिए, क्योंकि गर्भ का भार सहने के कारण गर्भवती सहवास में वैसा सहयोग नहीं दे सकती, जैसा कि देना चाहिए या देना चाहती है। कामवेग के जोश में यदि पति संतुलित और नियमित ढंग से व्यवहार करने का ख्‍याल न रख सके तो गर्भस्थ शिशु को आघात लग सकता है और गर्भवती को पीड़ा हो सकती है। पाँचवें, छठे माह तक तो विशेष अड़चन नहीं होती पर फिर जैसे जैसे गर्भ का आकार बढ़ता है, वैसे-वैसे असुविधा होती है, इसीलिए पत्नी की सुविधा का पूरा ध्यान रखकर ही गर्भकाल में सहवास किया जा सकता है। साथ ही यह भी याद रखना चाहिए कि गर्भस्थ शिशु गर्भवती के आचार-विचार का प्रभाव भी ग्रहण करता है। सातवां महीना पूरा होने के बाद सहवास नहीं करना ही उचित है।
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