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उर्दू साहित्य
आज का शेर
अफ़सोस तो ये है कि मेरे मद्दे मुक़ाबिल
शुक्रवार,फ़रवरी 6, 2009
ये तज्रबे सफर के किसी और को सुना
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
तर दामनी पे शेख हमारी न जइयो
कमसिनी का हुस्न था वो, ये जवानी की बहार
फ़रिश्ते वक़्त से पहले अज़ाब देने लगे
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
रोशनी बाँट ली उभरे हुए मीनारों ने
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
गंजीनाए माअनी का तिलिस्म उसको समझये
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
वाजिब है मालदार को देना ज़कात का
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
9
तुझे न माने कोई इससे तुझको क्या मजरूह
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
या रब न वो समझे हैं न समझेंगे मेरी बात
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
रोक सकता हमें ज़िन्दान-ए-बाला क्या मजरूह
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
फूल की पत्ती से कट सकता है हीरे का जिगर
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
तुम हो क्या, ये तुम्हें मालूम नहीं है शायद
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
देश की ख़ातिर मिटादे अपनी हस्ती तू नदीम
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
उस आफ़ताबे शहर को उर्दू ज़ुबान में
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
मुझी को नाज़ से देखा जला जो परवाना
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
17
दी मुअ़ज्ज़न ने अज़ां वस्ल की शब पिछले पहर
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
मुत्तसिल रोने से शायद कि बुझे आतिशे दिल
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
ख़्याल-ए-वस्ल को अब आरज़ू झूला झुलाती है
शुक्रवार,जनवरी 23, 2009
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