TV Article | आनंदी को मारना जरूरी था क्या?
बालिका वधू में ट्विस्ट
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एक साथ कई समस्याओं पर अपनी सामाजिक चिन्ता पेश करने की होड़ के चलते इस धारावाहिक के साथ अनावश्यक प्रयोग किए गए। क्या ये बेहतर नहीं होता कि जिस तरह का प्रभाव ये सीरियल डाल रहा था उसके मद्देनजर आनंदी को बड़ी बताकर किसी पद पर आसीन दिखा दिया जाता। अगर 'अविका' इस धारावाहिक को छोड़ना भी चाहती तो सहजता से छोड़ सकती थी, 'उतरन' की 'इच्छा' की तरह।
अगर आनंदी नहीं मरती और संघर्षों के बाद हासिल शिक्षा का लाभ गाँव की दूसरी महिलाओं को देती तो कितनी आनंदियों का आत्मविश्वास बढ़ता? अगर वह किसी अच्छे बड़े पद पर ना सही, (दादीसा की भाषा में कहे तो 'कलेक्टरनी') छोटी-मोटी ग्राम सेविका या शिक्षिका भी बन गई होती तो ना जाने कितनी बाल विवाह की शिकार मासूम आनंदी, फूली और आशा( इसी सीरियल की पात्र हैं) के ख्यालों में प्रेरणा के बीज बो देती।
मगर नहीं जो मजा सीरियल से 'दिल' से जुड़े दर्शकों का दिल तोड़ देने में है वो संदेश देने में कहाँ? हाँलाकि डायरेक्टर-प्रोड्यूसर यह सिद्ध करने की कोशिश में लगे रहे कि यह धारावाहिक समाज की कुरीतियों के खिलाफ एक आवाज उठा रहा है। अगर यह सच है तो इस आवाज में बार-बार दरार क्यों पड़ जाती है? 'जगदीश' के साथ बरती भयावहता इसलिए सहन की जा सकती हैं कि इसे देखकर कई किशोर मुंबई जाने से पहले दो बार सोचेंगे। वैसे दिखाए गए दृश्यों में हिंसा का इतना विकृत रूप भी जरूरी नहीं था। पर ठीक है, अगर गाँव के भोलेभाले बच्चे इसे देखकर डरते हैं तो यह डर अच्छा है।
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मरे हुए को जिन्दा करने में ये लोग इतने माहिर हैं कि यमराज को भी कोफ्त होने लगती है। ललाट पर लगी गोली से अमुमन कोई बचता नहीं है, सो आनंदी भी नहीं बचेगी। पर सीरियल वालों की माया निराली है, हम उनके भरोसे हैं, भगवान के नहीं। देश भर में आई आँसुओं की बाढ़ से उनका कलेजा पसीज भी सकता है और जिन्दा हो सकती है आनंदी। ठीक वैसे ही जैसे किसी जमाने में एकता कपूर को 'मिहिर' को वापिस धरती पर लाना पड़ा था। देखते हैं, आगामी एपिसोड की भागदौड़ का नतीजा क्या निकलता है?

