मंगलवार, 3 मार्च 2026
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Written By ND

बेचारा गेंडा शरमा गया

- अर्द्धेन्दु भूषण

प्राणी संग्रहालय
ND

मैं अपने बच्चे के साथ प्राणी संग्रहालय गया था। सभी प्राणियों को पता होता है कि लोग उन्हें ही देखने आते हैं। इस कारण सब अपने स्वभाव के अनुसार लोगों का मनोरंजन करने की कोशिश करते हैं। मैं कई पिंजरों में घूमता हुए गेंडा महाशय के दरबार में पहुँचा। आमतौर पर सिर उठाकर अपने विशाल कक्ष में घूमते रहने वाले ये महाशय कहीं नजर नहीं आए। काफी तलाश की। भालू से पूछा, बंदर से पूछा। किसी को कोई जानकारी नहीं। काफी कोशिश के बाद वे दिखाई दिए।

मैं उन्हें देखकर दंग रह गया। यह क्या? उन्होंने सिर छुपा रखा था। कोई हलचल नहीं। चिड़ियाघर के एक कर्मचारी से पूछा, भिया आखिर इन्हें क्या हो गया? कहीं ठंड तो नहीं लग गई।

कर्मचारी ने कहा, इन्हें क्या ठंड लगेगी दुनिया में सबसे मोटी चमड़ी तो इन्हीं की है। मैं परेशान सा इधर-उधर घूमता रहा। तभी प्राणियों की बिरादरी में सबसे चालाक कही जाने वाली लोमड़ी पर नजर पड़ी। मैं उसके पिंजरे के बाहर कुछ देर तक खड़ा रहा। काफी मिन्नतों के बाद उसने मुँह खोला।

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'तुम्हारे शहर में बहुत दुःखी है गेंडा। यहाँ उससे मोटी चमड़ी वाले बहुत हैं। अब उसी दिन की बात देखो-बीआरटीएस को लेकर कितनी खिंचाई हुई। बाहर के लोग आकर यहाँ के अधिकारियों को खरी-खोटी सुना गए। कुछ हुआ क्या? देख लेना एबी रोड अभी साल-दो साल और खुदी रहेगी। इन्होंने तो हमारे घर (प्राणी संग्रहालय) के बाहर भी एकाध साल से तोड़फोड़ मचा रखी है। सुना है, इससे पहले भी भोपाल, दिल्ली में इन सबकी लू उतारी जा चुकी है। गेंडा इन्हीं घटनाओं से दुःखी है।

कह रहा था कि जहाँ इतनी मोटी चमड़ी के लोग हैं, वहाँ उसे देखने प्राणी संग्रहालय में कौन आएगा, वह भी पैसे देकर। यहाँ तो हर दफ्तर, हर पार्टी, हर जगह गेंडे जैसी चमड़ीवाले मुफ्त में देखने को मिल जाते हैं।'

लोमड़ी की बात सुन मुझे भरोसा नहीं हुआ। सोचा, बेचारे अधिकारी लोग हैं, उन्हें कामकाज से इतनी फुर्सत कहाँ है जो सड़क जैसी छोटी बातों पर ध्यान दें। मैं एक बार फिर से गेंडे के पास गया, वह उसी स्थिति में था। इसके बाद मैं प्राणी संग्रहालय से बाहर आ गया।

कुछ घटनाएँ आँखों के सामने तैर गईं। शराब दुकानों का खूब विरोध हुआ-नतीजा क्या निकला? मास्टर प्लान में ग्रीन बेल्ट बचाने की बात पर जनता छाती कूटती रही। हाई कोर्ट की मनाही के बाद भी खूब जुलूस निकल रहे हैं।

बड़ी-बड़ी योजनाएँ अधूरी पड़ी हैं, जिम्मेदार शान से लाल-पीली बत्ती में घूम रहे हैं। नर्मदा ज्यादा पानी लेकर आ गई, पर टूटे-फूटे पाइप नहीं बदले गए। अपराधी सीना तान सड़कों पर हैं, पुलिस दुम दबाकर दुबकी है। अब क्या-क्या याद करें?... ऐसे में बेचारा गेंडा शरमाए नहीं तो और क्या करे?