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Written By ND

राजेश खन्ना : ऊपर आका, नीचे काका!

राजेश खन्ना
- अखिलेश पुरोहित

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कामयाबी के शिखर तक पहुँचना तो ज्यादा मुश्किल नहीं होता पर वहाँ टिके रहना अधिक कठिन है। यह बात राजेश खन्ना के मामले में बिलकुल फिट बैठती है। ऐसा कहकर आलोचना नहीं की जा रही है बल्कि दुनिया का दस्तूर ही यह है। पर जब रोमांटिक फिल्मों की बात हो तो राजेश खन्ना का नाम सबसे पहले होगा।

सत्तर के दशक में उनकी लोकप्रियता का यह आलम था कि लड़कियाँ उन्हें खून से खत लिखा करती थीं। महिलाएँ ट्रैफिक सिग्नल पर उनकी कार के रुकने का इंतजार करती थीं ताकि उन्हें देख सकें। कार के रुकते ही उसके शीशों पर किस किया करती थीं। जब उनकी सफेद कार उनके कंपाउंड में वापस आती थी तो वह गुलाबी हो चुकी होती थी! संवाद अदायगी के अपने अलहदा अंदाज और छेड़ती आँखों से वे जो जादू परदे पर पैदा करते थे उसका दीवाना पूरा हिन्दुस्तान था। उन्हें प्यार से काका कहा जाता है और उस जमाने में उनके बारे में एक बात कही जाती थीः "ऊपर आका, नीचे काका"।

आज एक शब्द का शोर सुनाई देता हैः "गर्ल नेक्स्ट डोर" पर राजेश खन्नाा "बॉय नेक्स्ट डोर" थे। हर लड़की उनमें अपना दोस्त, प्रेमी और पति देखती थी। उनका सुंदर, सलोना चेहरा सभी के दिल में उतर जाता था।

राजेश खन्ना का जन्म 29 दिसंबर 1942 को अमृतसर में हुआ। फिल्म इंडस्ट्री में उनका पदार्पण एक टैलेंट हंट के जरिए हुआ था। उनकी पहली फिल्म "आखिरी खत" थी जो 1966 में आई। लेकिन पहली बड़ी सफलता उन्हें "आराधना" (1969) के रूप में मिली। इस फिल्म ने उन्हें रातोंरात स्टारडम की दहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया। उसके बाद उनका सफर उछाल मारते हुए शिखर तक पहुँचा। उन्होंने लगातार कई हिट फिल्में दीं।

बेशक, वे हिन्दी सिनेमा के पहले सुपरस्टार थे। जब वे चरम पर थे तब फिल्म में उनका होना फिल्म के हिट होने की गारंटी होती थी। "आराधना" के लिए उन्हें फिल्म फेयर बेस्ट एक्टर अवॉर्ड के लिए नामांकित भी किया गया। इसके बाद तो जैसे हिट फिल्मों की झड़ी लग गई। 1969 में ही "इत्तेफाक" और "दो रास्ते", 1970 में "सफर", "कटी पतंग", "द ट्रेन", "सच्चा-झूठा" और "आन मिलो सजना", 1971 में "हाथी मेरे साथी", "दुश्मन", "अमर प्रेम", और "आनंद", 1972 में "मेरे जीवन साथी", "बावर्ची", "जोरू का गुलाम", 1973 में "दाग", "आविष्कार" और "नमक हराम" और 1974 में "आप की कसम", "प्रेम नगर", और "रोटी" उनकी सर्वाधिक सफल फिल्मों की लिस्ट में हैं। उनका स्वर्णकाल 1970 से लेकर 1975 तक कहा जा सकता है जब उनकी ज्यादातर फिल्में हिट रहीं।

"जंजीर" के समय अमिताभ बच्चन का दौर आने के साथ ही राजेश खन्ना का दौर ढलान पर आने लगा पर बीच-बीच में आती कुछेक सफल फिल्मों ने उनके करियर को जिंदा रखा। ऐसी फिल्मों में 1877 की "अनुरोध", 1978 की "चक्रव्यूह", 1979 की "अमरदीप", 1980 की "थोड़ी-सी बेवफाई" और 1983 की "अवतार" एवं "सौतन" शामिल हैं।

पागलपन की हद तक था क्रेज
अपने प्रशंसकों के बीच, खासकर महिलाओं के बीच जो लोकप्रियता राजेश खन्ना ने पाई वह और कोई नहीं पा सका। उनका क्रेज इस कदर था कि लड़कियों ने उनके फोटोग्राफ से ही शादी कर ली थी और कई तो अपनी उँगली काटकर खून से ही माँग भर लेती थीं! जब राजेश खन्ना ने डिंपल से शादी की तो कइयों ने आत्महत्या का प्रयास भी किया।

एक बार का वाकया है जब वे बीमार पड़े। तब एक कॉलेज के ग्रुप ने उनकी तस्वीर पर बर्फ की थैली से सिंकाई की ताकि बुखार जल्दी उतर जाए! एक बार उनकी आँख में इंफेक्शन हो गया तो लड़कियों ने आईड्रॉप खरीदकर उनके पोस्टर पर ही लगाया!

इस बात से राजेश खन्ना पूरी तरह वाकिफ थे कि उनकी लोकप्रियता किस मुकाम तक पहुँच चुकी है... और वे स्वयं को आत्ममुग्ध होने से नहीं बचा पाए। सफलता के शीर्ष पर यदि कोई आपका सबसे बड़ा शत्रु होता है तो वह और कोई नहीं आप ही होते हैं। यही बात काका के लिए नुकसानदेह रही। इस बात का जब उन्हें पता चला तब तक वह दौर पूरी तरह से खत्म हो चुका था। जिस ग्लैमर को उन्होंने हासिल किया वही उनके लिए नुकसानदेह साबित हुआ।

अपनी जीवनशैली के कारण भी वे काफी विवादों में रहे। इसी कारण उन्हें अच्छी फिल्में मिलना बंद हो गईं। नाम के नशे ने उनके काम पर असर डाला। वे जब कहीं छुट्टियाँ मनाने जाते थे तो अपने साथ दोस्तों की फौज लेकर जाते थे। उन्हें हमेशा लोगों से घिरा रहना और आकर्षण का केन्द्र बना रहना पसंद था।

राजनीति में पड़ाव
राजीव गाँधी के कहने पर राजेश खन्ना ने राजनीति में उतरने का मन बनाया। 1991 के आम चुनाव में नई दिल्ली सीट से वे लालकृष्ण आडवाणी से मात्र डेढ़ हजार वोटों से हारे। जब आडवाणीजी ने गाँधीनगर सीट अपने पास रखते हुए नई दिल्ली सीट छोड़ दी, तो उप चुनाव में राजेश खन्ना भाजपा के शत्रुघ्न सिन्हा को हराकर संसद पहुँच गए। 1996 तक वे सांसद रहे पर राजनीति उन्हें रास नहीं आई। इस बीच उनकी फिल्में भी आईं पर कुछ सफलता नहीं मिली।

तीन देवियाँ ...!
रोमांस राजेश खन्ना के जीवन का सबसे रोचक पहलू है। उनकी जिंदगी में मुख्यतः तीन महिलाओं का प्रभाव रहा। पहले उनका अफेयर अंजू महेंद्रू के साथ रहा। खुद अंजू के शब्दों में,"हमारे रिश्ते में हमेशा कन्फ्यूजन रहा। राजेश को अल्ट्रा मॉडर्न लड़कियाँ आकर्षित करती थीं। पर अगर मैं कभी स्कर्ट पहनती थी, वे कहते थे तुम साड़ी क्यों नहीं पहनती! और मैं साड़ी पहनती थी तो कहते थे तुम भारतीय नारी क्यों बन रही हो! उनको बिलकुल पसंद नहीं था कि कोई उनकी आलोचना करे और मैं उनकी सबसे बड़ी आलोचक थी। मुझे अगर कोई बात बुरी लगती थी तो मैं उनके सामने ही कह देती थी। एक दौर ऐसा था जब उनकी जिंदगी मेरे इर्दगिर्द सिमटी हुई थी। मैं कहाँ हूँ और क्या कर रही हूँ, इसकी उनको पूरी जानकारी चाहिए होती थी।"

अंजू से संबंध टूटने के बाद राजेश खन्ना ने 1973 में ‘बॉबी’ से सनसनी बनीं डिम्ल से शादी कर ली। शीघ्र ही इस संबंध में दरार पड़ने लगी। डिम्पल के शब्दों में ‘मैं वैसा ही करती थी जैसा उन्हें पसंद था पर इसके लिए कभी उन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा। उनके आसपास के लोग उनके चमचों की तरह थे, उनके साथ भी मुझे तालमेल बैठान पड़ा। यह सीढ़ी चढ़ने जैसा था पर आप कैसे चढ़ रहे हैं, इससे उन्हें कोई मतलब नहीं था। वे अपने पर्स और दिल दोनों के मामले में खुले थे। उनके साथ जिंदगी उतार-चढ़ाव से भरी रही।
टीना मुनीम के साथ राजेश खन्ना की ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ काफी चर्चित रही थी। राजेश के बारे में टीना के शब्द थे, ‘हर झगड़े के बाद वे मुझे गिफ्ट से लाद देते थे, वे हमेशा मुझे लुभाते रहते थे।‘

राजेश खन्ना कभी समय के साथ ढल नहीं पाए। वर्तमान में वे फिर परदे पर दमदार वापसी करने की कोशिश कर रहे हैं पर उन्हें वैसे रोल नहीं मिल पा रहे हैं। कुछ समय पहले उनकी एक फिल्म ‘वफा’ भी आई थी। वापसी के बाद फिर कैमरे का सामना करने की बात पर काका का कहना है, ‘मुझे यह बहुत मुश्किल लग रहा था पर जब मैं कैमरे के सामने खड़ा हुआ तो सब आसान हो गया। वाकई इस दुनिया में शो बिजनेस के जैसा दूसरा बिजनेस नहीं है।‘ जो जलवा काका ने जमाने को दिखाया था, वह अब वापस तो नहीं आ सकता पर उस दौर में जो स्टारडम उन्हें हासिल हुआ वह अद्‍भुत था।

(नईदुनिया)

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