जगजीत के न होने से गजल भी उदास है!
- संजय पटेल
गजल सुनने का शौक़ हो और आपने जगजीतसिंह का नाम न सुना हो ऐसा मुमकिन नहीं। इस आवाज ने एशिया महाद्वीप में तलत मेहमूद, बेगम अख्तर, केएल सहगल और मेहदी हसन के बाद सबसे ज्यादा मकबूलियत हासिल की। यूँ शुरुआत में वे फिल्म संगीत से खासे मुतास्सिर थे लेकिन उनकी रूह में क्लासिकल संगीत हरदम घुमड़ता रहता था। श्रीगंगानगर (राजस्थान) के उस्ताद जमाल खान से उन्होंने बाक़ायदा तालीम हासिल की थी। जब मुंबई पहुँचे तो काम तो एकदम मिल नहीं सकता था तो कई कॉलेजों के रेस्टॉरेंट्स में फिल्मी गीत गाकर गुजारा किया। इसमें कोई शक नहीं कि जगजीतसिंह के मन में गजल को लेकर एक तूफ़ान था और बतौर संगीतकार उनके मन में यह लक्ष्य स्पष्ट था कि रिवायती अंदाज से हटकर कुछ नया नहीं किया गया तो रही सही गजल भी मर जाएगी। जगजीतसिंह के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ने वालों की भी बड़ी तादाद है। वजह ये थी कि जगजीत कामयाबी की ऐसी कहानी रच चुके थे कि वे अपनी शर्त पर कंसर्ट को चलाते थे। तकरीबन चार बार उनके लाइव कंसर्ट को एंकर करते हुए मैंने यह महसूस किया था कि वे सुनने वालों के मूड को अपने गणित से भाँपते थे और क्या गाना, क्या नहीं खुद तय करते थे। उन्हें सुनने वालों की नब्ज का अंदाजा अपनी पहली पेशकश से लग जाता था और मंच पर वे हर लम्हा मानसिक रूप से चैतन्य रहते थे। पुत्र विवेक की मृत्यु के बाद तबला वादक अभिनव उपाध्याय और वायलिन वादक दीपक पंडित जैसे युवा कलाकारों के साथ उन्होंने अपनी टीम बनाई और पूरी दुनिया में गजल का जादू बिखेरा। जगजीतसिंह की सबसे बड़ी ताकत थी अच्छी शायरी की पहचान और करिश्माई और खरज भरा स्वर जो ऐसी प्रतीति देता था मानो ये आवाज पाताल से गूँजती हुई हमारे कानों में आ रही है। इस बात का श्रेय भी जगजीतसिंह के माथे जाता है कि इस फनकार ने चित्रपट संगीत जैसी लोकप्रिय विधा के सामने गजल का विराट शामियाना खड़ा किया। अस्सी और नब्बे के साल के बीच जगजीतसिंह के एलबम्स ने रेकॉर्डतोड़ बिक्री की और किसी-किसी बरस फिल्मी सीडियों और कैसेट्स की बिक्री को पीछे छोड़ा। बीते तीस बरस का वक्त गजल के उस सुरीलेपन का दौर है जिसकी शिनाख्त बिला शक जगजीतसिंह की गजलों से होती है। सुदर्शन फ़ाखिर, निदा फाजली जैसे शायरों को जगजीतजी ने खूब गाया और दाद बटोरी। जगजीतसिंह के भीतर गायक के साथ एक उम्दा कम्पोजर भी हर वक्त जिंदा रहा। उनके करियर की लोकप्रियता में इस कम्पोजर का बड़ा हाथ है और बदकिस्मती से इस बात को कहीं खासतौर पर रेखांकित भी नहीं किया गया है। गुलजार के टीवी धारावाहिक गालिब में जरूर इस बात को थोड़ा बहुत महसूस किया गया लेकिन बाज मौकों पर कम्पोजर जगजीत गुमनाम ही रहे। बहरहाल जगजीतसिंह का जाना गजल के ख़ामोशी से आँसू बहाने का दिन है। इन आँसुओं में न केवल अपने महबूब गुलूकार के लिए मुहब्बत का इजहार है बल्कि यह घबराहट भी शामिल है कि क्या जगजीतसिंह के बाद बेसुरापन अपने पाँव जमाने में कामयाब हो जाएगा। जगजीतसिंह आपके होने से सुर की आस जो बनी रहती थी।जगजीतसिंह के गाए प्रसिद्ध फिल्मी गीत होंठों से छू लो तुम - प्रेम गीतहोश वालों को खबर क्या - सरफरोश तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो - अर्थझुकी-झुकी सी नजर बेकरार - अर्थ चिठ्ठी न कोई संदेश - दुश्मनप्यार मुझसे जो किया तो क्या पाओगे - साथ-साथतुमको देखा तो ये ख्याल आया - साथ-साथ कोई फरियाद तेरे दिल में - तुम बिन जगजीतसिंह द्वारा गाई गई प्रसिद्ध रचनाएँबात निकली है तो फिर दूर तलक जाएगीवो कागज की कश्ती वो बारिश का पानीबहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैंदुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना हैआए हैं समझाने लोग कल चौदहवीं की रात थीतुम नहीं, गम नहीं, शराब नहीं तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो हुजूर आपका भी एहतरामउस मोड़ से शुरू करेंदेर लगी आने में तुमकोमिलकर जुदा हुए तो नसोचा नहीं अच्छा बुरा तेरे खुशबू में बसे खतजगजीत के प्रसिद्ध अलबम्समरासिम * मिराज * इनसाइट * डिजायर्स* चिराग * फेस टू फेस * इनसर्च * सजदा * होप * समवन समव्हेयर * बियांड टाइम * ईकोज * मैं और मेरी तन्हाई