अयोध्या में उम्मीदें : जिंदगी के सातवें दशक से गुजर रहे मिश्र उस वाकये को कुछ यूं याद करते हैं, 'मुझे शुरुआत में कुछ शक था और मैंने उनसे कहा भी यह थाईलैंड का अयुता हो सकता है। थाईलैंड में भी एक अयोध्या है। लेकिन वे इस बात को लेकर आश्वस्त थे और पूरी रिसर्च करके आए थे।'

दोनों शहरों के बहनापे वाले रिश्ते से अयोध्या में उम्मीदें जगी हैं। लेकिन राजकुमारी की याद में एक स्मारक बनवाने के बाद कोरियाई लोगों के पीछे हट जाने से वे उम्मीदें धूमिल पड़ गई हैं।
बसपा के टिकट पर चुनाव हार चुके मिश्र आरोप लगाते हैं, 'अयोध्या को इस सहयोग से कोई फायदा नहीं हुआ है। कोरियाई लोगों की बड़ी योजनाएं थी लेकिन भारत के शासकों ने बहुत ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली।'
राजकुमारी में दिलचस्पी : फैजाबाद-अयोध्या के मौजूदा भाजपा सांसद लल्लू सिंह उस समय की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार का बचाव करते हुए कहते हैं कि कोरियाई लोग ही पीछे हट गए थे।
वे कहते हैं, 'कोरियाई लोगों ने कुछ नहीं किया। और अब इस मुद्दे को उठाने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है।'अयोध्या में धार्मिक पर्यटन को प्रोत्साहित करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखने का दावा भी लल्लू सिंह करते हैं।
बिमलेंद्र मिश्र के बेटे अफसोस जताते हुए कहते हैं, 'अयोध्या की राजकुमारी में खासी दिलचस्पी होने के बावजूद इस पवित्र शहर में कोरिया से कोई सैलानी नहीं आया। बस कुछ लोग रस्मी तौर पर अपनी श्रद्धांजलि देने आते रहे।'

इतिहास की खामोशी : बिमलेंद्र मिश्र को उम्मीद है कि दक्षिण कोरिया में अगले चुनाव के बाद कारक वंश के किसी व्यक्ति के सत्ता में आने के बाद तस्वीर बदलेगी। वहां अगले चुनाव 2017 में होने हैं।
हालांकि भारत में इस बात पर कई लोगों को हैरत है कि यहां के इतिहास में अयोध्या की किसी राजकुमारी के कोरिया जाने की बात पर खामोशी है। हालांकि उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग के एक ब्रोशर में कोरिया की रानी का जिक्र है। इस बात के कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं हैं कि राजकुमारी राम के पिता राजा दशरथ की वंशज थीं।