प्रेम कविता : संकोच


शर्मे हयात गर तू यूं करती रही
जिन्दगी की पतवार फिर, न संभले कभी
बीत जाएगी जिन्दगी मेरी, फिर उस जहां में
जहां हुस्ने-मलिकाएं नित संवरती रही
जिगरे नांदा को न तोड़ ओ मेरे दिले नूर
वर्ना मिल जाएगी बहलाने, कई जन्नते हूर
पीव दिले करे गर मेरा, जन्नत की हूर
हुजूर जाएगा कहां फिर तेरा ये शबाबे नूर
मुझे इल्जाम न लगा देना का, हो अपने में गरूर
रबे ढ़ह जाएगी शराफत की दीवारे, गर रहा उसे मंजूर।




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